मिशन 2026: शशि थरूर और कांग्रेस आलाकमान के बीच जमी बर्फ पिघली, ‘भाजपा समर्थक’ छवि पर सांसद ने तोड़ी चुप्पी
नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम: भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में से एक और तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर तथा पार्टी आलाकमान के बीच लंबे समय से चला आ रहा मनमुटाव अब आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया है। दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के साथ हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद थरूर ने न केवल अपनी निष्ठा को स्पष्ट किया, बल्कि उन तमाम अटकलों पर भी विराम लगा दिया जिनमें उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने या पार्टी बदलने की खबरें सुर्खियां बटोर रही थीं। इस मुलाकात को आगामी चुनावों से पहले कांग्रेस के भीतर एकजुटता दिखाने के एक बड़े प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
पिछले कुछ महीनों से केरल की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर शशि थरूर के बयानों को लेकर विवादों का बाजार गर्म था। कई मौकों पर पार्टी लाइन से हटकर दिए गए उनके बयानों के कारण उनके आलोचकों और मीडिया के एक वर्ग ने उन्हें ‘प्रच्छन्न भाजपा समर्थक’ के रूप में चित्रित करना शुरू कर दिया था। हालांकि, दिल्ली से तिरुवनंतपुरम लौटने के बाद शुक्रवार को मीडिया से मुखातिब होते हुए थरूर ने इन धारणाओं को पूरी तरह सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिन बयानों को भाजपा के प्रति झुकाव के रूप में देखा गया, वे दरअसल ‘देश समर्थक’ या ‘सरकार समर्थक’ रुख थे, न कि किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा के प्रति प्रेम।
शशि थरूर ने अपने कूटनीतिक अनुभव का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब बात अंतरराष्ट्रीय मंचों या वैश्विक कूटनीति की आती है, तो वे दलीय राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना पसंद करते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि विदेशी मामलों में राजनीति करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा नहीं है और उन्होंने हमेशा भारत की बात करना पसंद किया है। थरूर ने जोर देकर कहा कि यह कोई नया रुख नहीं है, बल्कि वे अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में इसी सिद्धांत का पालन करते आए हैं। उनके अनुसार, देश के बारे में बात करने का मतलब यह नहीं है कि वे अपनी पार्टी की विचारधारा से दूर जा रहे हैं।
विवादों की शुरुआत दरअसल पिछले वर्ष भारत-पाकिस्तान संघर्ष और पहलगाम हमले के बाद हुई थी। उस दौरान कूटनीतिक बातचीत और रणनीतिक प्रतिक्रिया को लेकर थरूर की टिप्पणियों को कांग्रेस के आधिकारिक स्टैंड से अलग माना गया था। पार्टी के ही कुछ आंतरिक गुटों ने उन पर निशाना साधते हुए उनके इरादों पर सवाल खड़े किए थे। अपनी सफाई में थरूर ने अब स्वीकार किया है कि एक अनुशासित पार्टी कार्यकर्ता और सांसद के रूप में उन्हें पार्टी लाइन का सम्मान करना चाहिए, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि संसद के भीतर वे हमेशा कांग्रेस की ढाल बनकर खड़े रहे हैं और उनके वोटिंग रिकॉर्ड या विधायी कार्यों में कभी कोई भटकाव नहीं दिखा है।
थरूर की नाराजगी का एक बड़ा कारण केरल की स्थानीय राजनीति भी थी। हाल ही में कोच्चि में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उनके साथ किए गए व्यवहार और केरल कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा उन्हें हाशिए पर धकेलने की कोशिशों से वे आहत थे। सूत्रों के अनुसार, इसी संदर्भ में उन्होंने खरगे और राहुल गांधी के सामने अपनी शिकायतें रखीं। 29 जनवरी को हुई इस बैठक के बाद थरूर के चेहरे की मुस्कान ने बहुत कुछ बयां कर दिया। उन्होंने कहा कि बैठक सकारात्मक रही और अब पूरी पार्टी एक ही लक्ष्य की ओर काम कर रही है। उन्होंने उन खबरों को कपोल-कल्पित बताया जिनमें उनके कांग्रेस छोड़ने की बात कही जा रही थी।
पत्रकारों द्वारा सीधे पूछे गए सवाल कि क्या वे कांग्रेस में बने रहेंगे, पर थरूर ने कड़े लहजे में कहा कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं। उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि वे न केवल कांग्रेस में रहेंगे, बल्कि आगामी चुनावों में केरल के भीतर संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) की भारी जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरी ताकत के साथ प्रचार करेंगे। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि उन्हें बार-बार अपनी निष्ठा साबित करने के लिए बयान क्यों देने पड़ रहे हैं। थरूर का यह बयान उन विरोधियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो पार्टी के भीतर उनके कद को छोटा करने की कोशिश कर रहे थे।
कांग्रेस के लिए शशि थरूर का साथ बने रहना रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। थरूर की वैश्विक छवि, बौद्धिक क्षमता और युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता पार्टी के लिए एक बड़ी संपत्ति है। विशेषकर केरल में, जहां वामपंथी मोर्चे और भाजपा के बीच मुकाबला त्रिकोणीय होता जा रहा है, वहां थरूर जैसे कद्दावर नेता की सक्रियता यूडीएफ के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। आलाकमान ने भी शायद यह महसूस किया है कि थरूर की ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग पार्टी को मजबूत करने के लिए करना ही बुद्धिमानी है।
इस सुलह के साथ ही अब कांग्रेस के भीतर ‘थरूर बनाम अन्य’ का अध्याय समाप्त होता दिख रहा है। दिल्ली की इस बैठक ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मतभेद चाहे कितने ही गहरे क्यों न हों, बड़े उद्देश्यों के लिए उन्हें दरकिनार किया जा सकता है। शशि थरूर अब एक नई ऊर्जा के साथ चुनावी मैदान में उतरने को तैयार हैं, और उनका यह नया रुख न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह भरेगा, बल्कि भाजपा की उन उम्मीदों पर भी पानी फेर देगा जो थरूर के रूप में एक बड़े चेहरे की तलाश में थीं। आगामी महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी थरूर की विशिष्ट प्रतिभा का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह करती है।