महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनावों का शंखनाद: भाजपा और अजित पवार के बीच छिड़ा नया ‘वाकयुद्ध’
महाराष्ट्र की सत्ता के गलियारों में एक बार फिर सियासी पारा चढ़ गया है। आगामी नगर निकाय चुनावों से ठीक पहले महायुति गठबंधन के भीतर खींचतान की खबरें सतह पर आ गई हैं। इस बार विवाद का केंद्र बना है पुणे का महत्वपूर्ण औद्योगिक शहर पिंपरी-चिंचवड़। उपमुख्यमंत्री अजित पवार द्वारा पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम (पीसीएमसी) में भ्रष्टाचार और बढ़ते कर्ज को लेकर लगाए गए आरोपों ने भारतीय जनता पार्टी को रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने शनिवार को कड़ा पलटवार करते हुए अजित पवार को ‘आत्ममंथन’ करने की सलाह दी है। इस राजनीतिक टकराव ने साफ कर दिया है कि गठबंधन में होने के बावजूद, स्थानीय निकाय चुनावों में वर्चस्व की लड़ाई उतनी ही तीव्र है जितनी किसी विपक्षी दल के साथ होती है। भाजपा ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि आरोपों का सिलसिला नहीं रुका, तो वे भी चुप नहीं बैठेंगे।
रविंद्र चव्हाण का तीखा पलटवार: क्या अजित पवार का निशाना मोदी की पार्टी है?
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने अजित पवार के आरोपों को निराधार बताते हुए उन्हें आईना दिखाने की कोशिश की। चव्हाण ने कहा कि सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने से पहले पवार को अपनी राजनीतिक यात्रा और उन पर लगे आरोपों की गहराई को समझना चाहिए। उन्होंने एक बड़ा सवाल दागते हुए पूछा कि अजित पवार स्पष्ट करें कि वे किस पर निशाना साध रहे हैं? क्या उनके आरोपों का रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की ओर है? चव्हाण ने तंज कसते हुए कहा कि अगर भाजपा ने भी पलटवार करते हुए आरोप-प्रत्यारोप का पिटारा खोल दिया, तो अजित पवार के लिए खुद को बचाना मुश्किल हो जाएगा और उनके लिए गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है। भाजपा अध्यक्ष का यह बयान गठबंधन की नाजुक डोर की ओर भी संकेत करता है, जहाँ एक सहयोगी दूसरे सहयोगी की कार्यप्रणाली पर सरेआम सवाल उठा रहा है।
पिंपरी-चिंचवड़ का चुनावी रण: 2017 से 2022 का इतिहास और 15 जनवरी की चुनौती
विवाद की असली वजह पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम के आगामी चुनाव हैं, जो 15 जनवरी को होने तय हुए हैं। गौरतलब है कि 2017 से 2022 तक इस नगर निगम पर भाजपा का एकछत्र राज रहा था। इसके बाद कार्यकाल समाप्त होने पर वहां प्रशासक की नियुक्ति की गई थी। अजित पवार ने हाल ही में दावा किया था कि भाजपा के पांच साल के शासन के दौरान निगम भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया और शहर पर कर्ज का बोझ बढ़ गया। भाजपा इसे चुनावी स्टंट मान रही है। रविंद्र चव्हाण के अनुसार, चुनाव सिर पर देखकर अजित पवार इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं ताकि राजनीतिक लाभ लिया जा सके। उन्होंने कहा कि पीसीएमसी में भाजपा का शासन पारदर्शी रहा है और विकास के नाम पर जनता का भरोसा उनके साथ है। चुनावों से ठीक पहले इस तरह के आरोपों ने मतदाताओं के बीच भी एक नई बहस छेड़ दी है कि आखिर विकास के दावों के पीछे की हकीकत क्या है।
दागी उम्मीदवारों को टिकट और अजित पवार का बचाव: सिंचाई घोटाले का फिर हुआ जिक्र
सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी महाराष्ट्र की राजनीति गरमाई हुई है। अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने निकाय चुनावों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले और जेल में बंद लोगों को उम्मीदवार बनाया है। इस विवाद पर अपनी सफाई देते हुए अजित पवार ने तर्क दिया कि जब तक अदालत किसी को दोषी करार नहीं दे देती, तब तक उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। उन्होंने इस दौरान खुद का उदाहरण देते हुए 70 हजार करोड़ रुपये के कथित सिंचाई घोटाले का जिक्र किया। पवार ने कहा कि उन पर भी सालों से आरोप लग रहे हैं, लेकिन कुछ साबित नहीं हुआ। हालांकि, भाजपा और अन्य विरोधी दलों ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा है कि राजनीति का अपराधीकरण समाज के लिए घातक है। आपराधिक छवि वाले लोगों को चुनावी मैदान में उतारने से गठबंधन की साख पर भी आंच आ सकती है।
महायुति बनाम विपक्ष: गठबंधन की मजबूती और निर्विरोध चुनाव के दावे
विवादों के बीच भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने गठबंधन की एकजुटता का भी दावा किया। उन्होंने कल्याण-डोंबिवली समेत कई नगर पालिकाओं और नगर निगमों का उदाहरण दिया, जहाँ भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। चव्हाण का मानना है कि भाजपा और शिंदे गुट के एक साथ आने से विपक्षी दल पूरी तरह से अप्रासंगिक हो गए हैं। उनके अनुसार, गठबंधन की ताकत इतनी अधिक है कि विपक्ष के पास लड़ने के लिए न तो मुद्दे हैं और न ही मजबूत उम्मीदवार। हालांकि, अजित पवार के साथ चल रही यह तनातनी इस ‘मजबूत गठबंधन’ की आंतरिक दरारों को उजागर कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नगर निकाय चुनावों के नतीजे यह तय करेंगे कि आने वाले समय में महाराष्ट्र की सत्ता का संतुलन किस करवट बैठेगा।
नैतिकता और सत्ता के बीच झूलती महाराष्ट्र की राजनीति
महाराष्ट्र में चल रहा यह घटनाक्रम दर्शाता है कि चुनाव जीतने के लिए अब नैतिकता और गठबंधन के शिष्टाचार को भी ताक पर रखा जा रहा है। एक तरफ भ्रष्टाचार के पुराने घाव हरे किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ ‘दागी’ चेहरों को चुनावी मोहरा बनाया जा रहा है। भाजपा का यह रुख कि वे प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर कोई भी समझौता नहीं करेंगे, यह दर्शाता है कि वे राज्य में ‘बड़े भाई’ की भूमिका को छोड़ने के मूड में नहीं हैं। वहीं, अजित पवार अपने अस्तित्व और प्रभाव को बनाए रखने के लिए आक्रामक रुख अपना रहे हैं। 15 जनवरी को होने वाले नगर निगम चुनाव केवल स्थानीय मुद्दे पर नहीं, बल्कि गठबंधन के सहयोगियों की साख और जनता के भरोसे की असली परीक्षा होंगे।