• January 31, 2026

महाराष्ट्र की राजनीति के ‘दादा’ का सफर थमा: अजित पवार का राजनीतिक जीवन, उपलब्धियां और विवादों का पूरा लेखा-जोखा

मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे कद्दावर और प्रभावशाली चेहरों में शुमार उपमुख्यमंत्री अजित पवार का 66 वर्ष की आयु में एक विमान हादसे में असामयिक निधन हो गया। बारामती के पास हुए इस हादसे ने न केवल उनके परिवार और समर्थकों को झकझोर दिया है, बल्कि राज्य की सियासत में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है जिसे भरना नामुमकिन है। ‘दादा’ के नाम से लोकप्रिय अजित पवार का व्यक्तित्व जितना दबंग था, उनका राजनीतिक सफर उतना ही उतार-चढ़ाव भरा और रिकॉर्ड्स से लैस रहा। चार दशकों तक महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र में रहने वाले अजित पवार के नाम एक ऐसा कीर्तिमान दर्ज है जो भारतीय राजनीति में विरले ही देखने को मिलता है।

अजित पवार के राजनीतिक कौशल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 13 वर्षों में उन्हें छह बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का अवसर मिला। वे राज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक, हालांकि गैर-लगातार, इस पद पर रहने वाले नेता बने। उनके उपमुख्यमंत्री बनने का सिलसिला 10 नवंबर 2010 को पृथ्वीराज चव्हाण के नेतृत्व वाली सरकार से शुरू हुआ था। इसके बाद वे अलग-अलग गठबंधनों और परिस्थितियों में इस पद की शोभा बढ़ाते रहे। सबसे चर्चित शपथ ग्रहण 23 नवंबर 2019 की सुबह का रहा, जब उन्होंने देवेंद्र फडणवीस के साथ अचानक शपथ लेकर पूरे देश को चौंका दिया था, हालांकि वह सरकार महज कुछ घंटों में ही गिर गई थी। इसके बाद वे उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी और फिर एकनाथ शिंदे-देवेंद्र फडणवीस की सरकार में भी उपमुख्यमंत्री के रूप में अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाते रहे।

22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले में जन्मे अजित अनंतराव पवार, एनसीपी प्रमुख शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार के पुत्र थे। उनके पिता फिल्म जगत के प्रसिद्ध राजकमल स्टूडियो में कार्यरत थे, लेकिन अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के नक्शेकदम पर चलते हुए राजनीति को अपना कार्यक्षेत्र चुना। अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे कम उम्र में ही सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने 1982 में मात्र 20 वर्ष की आयु में एक सहकारी चीनी संस्था का चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। 1991 उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ जब वे पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और लगातार 16 वर्षों तक उस पद पर काबिज रहे। उसी वर्ष वे बारामती से लोकसभा सांसद चुने गए, लेकिन अपने चाचा शरद पवार के लिए उन्होंने वह सीट छोड़ दी और राज्य की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया।

अजित पवार की सत्ता तक पहुंच उनके कड़े परिश्रम और संगठन पर पकड़ का परिणाम थी। 1992-93 में वे कृषि और बिजली राज्य मंत्री बने और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने बारामती विधानसभा क्षेत्र से लगातार 1995, 1999, 2004, 2009, 2014 और उसके बाद भी जीत का परचम लहराया। उन्होंने कृषि, बागवानी, बिजली और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। जल संसाधन मंत्री के रूप में कृष्णा घाटी और कोकण सिंचाई परियोजनाओं में उनकी भूमिका को आज भी याद किया जाता है। हालांकि, उनकी महत्वाकांक्षाएं हमेशा स्पष्ट थीं। 2009 में ही वे उपमुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन तब छगन भुजबल को यह जिम्मेदारी मिली। अंततः दिसंबर 2010 में उनका यह सपना पहली बार पूरा हुआ।

अजित पवार का राजनीतिक जीवन केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा; उनका विवादों से भी गहरा नाता रहा। 2013 में सूखे के दौरान बांधों में पानी की कमी को लेकर दिया गया उनका एक अमर्यादित बयान उनके करियर का सबसे विवादास्पद क्षण माना जाता है, जिसके लिए उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी। इसके अलावा, उन पर सिंचाई घोटाले और लवासा लेक सिटी प्रोजेक्ट में पद के दुरुपयोग के आरोप भी लगे। 2014 के चुनावों के दौरान मतदाताओं को कथित रूप से धमकाने के आरोपों ने भी सुर्खियां बटोरीं। हालांकि, इन तमाम कानूनी और राजनीतिक झंझावातों के बावजूद उनकी लोकप्रियता पर कभी आंच नहीं आई। वे हर बार विवादों से उबरकर और अधिक शक्तिशाली होकर राजनीति के पटल पर लौटे।

अजित पवार को एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता था जो फाइलों पर अपनी त्वरित पकड़ और कड़क प्रशासनिक शैली के लिए नौकरशाही के बीच भी प्रसिद्ध थे। शरद पवार के साथ उनके वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों की खबरें अक्सर मीडिया की सुर्खियां बनती थीं, विशेषकर जब उन्होंने पार्टी से अलग होकर भाजपा के साथ हाथ मिलाया था। लेकिन ‘दादा’ ने हमेशा खुद को अपने चाचा का सच्चा अनुयायी बताया। वे एनसीपी के भीतर युवाओं और कार्यकर्ताओं के सबसे पसंदीदा नेता थे क्योंकि वे सीधे संवाद और तत्काल निर्णय लेने में विश्वास रखते थे।

बुधवार सुबह जब वे अपने कार्यक्षेत्र बारामती के लिए निकले थे, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह महाराष्ट्र के इस दिग्गज जननायक की अंतिम यात्रा होगी। उनके निधन से महाराष्ट्र ने एक ऐसा राजनेता खो दिया है जो राज्य के विकास और सत्ता के समीकरणों को बखूबी समझता था। उनके जाने से न केवल एनसीपी और गठबंधन सरकार को क्षति पहुंची है, बल्कि बारामती की जनता ने अपना वह अभिभावक खो दिया है जो दशकों से उनकी समस्याओं के समाधान का एकमात्र जरिया था। महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का नाम हमेशा एक ऐसे योद्धा के रूप में दर्ज रहेगा जिसने अपनी शर्तों पर राजनीति की और अंत तक सत्ता के शीर्ष पर बना रहा।

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