महाकाल मंदिर वीआईपी दर्शन विवाद: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार, कहा—’धार्मिक नियमों पर मंदिर प्रबंधन ही ले फैसला’
नई दिल्ली: देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में ‘वीआईपी दर्शन’ की व्यवस्था को लेकर चल रहा कानूनी विवाद अब शांत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर के आंतरिक प्रबंधन के नियमों को तय करना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का हिस्सा नहीं है। शीर्ष अदालत के इस रुख के बाद अब मंदिर में दर्शन की व्यवस्था पूर्ववत जारी रहेगी।
यह मामला तब चर्चा में आया जब याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी ने शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर कर महाकाल मंदिर के गर्भगृह में विशिष्ट व्यक्तियों (वीआईपी) को मिलने वाली विशेष प्रवेश सुविधा को चुनौती दी थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि वीआईपी दर्शन की इस व्यवस्था से न केवल आम श्रद्धालुओं को घंटों इंतजार करना पड़ता है, बल्कि यह मंदिर की पवित्रता और समानता के धार्मिक सिद्धांत के भी विरुद्ध है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि गर्भगृह में सभी भक्तों के लिए एक समान नियम होने चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस दलील को स्वीकार करने से मना कर दिया। याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि धार्मिक मामलों का नियमन करना न्याय क्षेत्र का विषय नहीं है। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मंदिर के भीतर पूजा-अर्चना कैसे होगी, किन लोगों को प्रवेश दिया जाएगा और व्यवस्थाएं कैसी होंगी, यह तय करने का सर्वाधिकार मंदिर प्रबंधन और संबंधित अथॉरिटी के पास है। अदालत ने माना कि मंदिर प्रशासन ही बेहतर जानता है कि भीड़ को नियंत्रित करने और परंपराओं के निर्वहन के लिए कौन से कदम उठाना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका को उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए जो पूरी तरह से प्रशासनिक और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं। जजों ने कहा कि मंदिर का प्रबंधन करने वाले लोग जमीनी हकीकत और धार्मिक मर्यादाओं से अधिक वाकिफ होते हैं, इसलिए ऐसे मुद्दों पर फैसले लेने की जिम्मेदारी उन्हीं पर छोड़ देनी चाहिए।
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक स्तर पर इस याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन पीठ ने याचिकाकर्ता के लिए एक विकल्प खुला रखा है। अदालत ने दर्पण अवस्थी को सुझाव दिया कि यदि उन्हें दर्शन व्यवस्था में किसी प्रकार की विसंगति या असुविधा महसूस होती है, तो वे अपनी आपत्तियों और सुझावों को लेकर मंदिर अथॉरिटी (महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति) के समक्ष जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि मंदिर प्रबंधन उनकी बातों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र है।
महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन और गर्भगृह में प्रवेश को लेकर अक्सर विवाद की स्थिति बनती रही है। विशेष रूप से पर्वों और त्योहारों के दौरान जब लाखों की संख्या में श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं, तब वीआईपी और आम भक्तों के बीच की यह कतार चर्चा का विषय बनती है। मंदिर प्रशासन का हमेशा से यह तर्क रहा है कि विशिष्ट प्रोटोकॉल और सुरक्षा कारणों से वीआईपी दर्शन की व्यवस्था अपरिहार्य है, जबकि आम भक्तों की सुरक्षा के लिए भी कड़े नियम जरूरी हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि धार्मिक संस्थानों के प्रशासनिक और अनुष्ठानिक नियमों में न्यायिक हस्तक्षेप की एक सीमा है। यह आदेश अन्य धार्मिक स्थलों के प्रबंधन के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है, जहाँ दर्शन की विशेष व्यवस्थाओं को लेकर अदालतों में चुनौतियां दी जाती रही हैं। फिलहाल, महाकाल के भक्तों के लिए संदेश साफ है कि मंदिर की नियमावली का अंतिम निर्णय मंदिर समिति के हाथों में ही सुरक्षित है।