भारत-ईयू रणनीतिक साझेदारी में नए अध्याय का आगाज: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति ने साझा मूल्यों और मुक्त व्यापार समझौते पर दिया जोर
नई दिल्ली: भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के संबंधों में एक युगांतरकारी बदलाव देखने को मिला है। वैश्विक अनिश्चितता के वर्तमान दौर में भारत और यूरोपीय संघ ने न केवल अपने कूटनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई दी है, बल्कि साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक हितों के आधार पर एक मजबूत भविष्य की नींव भी रखी है। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के सम्मान में एक भव्य भोज का आयोजन किया। इस दौरान उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत और यूरोपीय संघ का सहयोग आने वाले समय में वैश्विक स्थिरता का आधार बनेगा।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में वैश्विक चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में दुनिया जिस प्रकार की अनिश्चितताओं से जूझ रही है, वहां भारत और यूरोपीय संघ के विचार और दृष्टिकोण में समानता एक सुखद संकेत है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि आज की जटिल वैश्विक समस्याओं का समाधान किसी एक देश के पास नहीं है, बल्कि इनका हल केवल साझा प्रयासों और सामूहिक इच्छाशक्ति से ही संभव है। राष्ट्रपति ने भारत और ईयू के बीच हाल ही में हुए महत्वपूर्ण समझौतों की सराहना करते हुए उन्हें रणनीतिक साझेदारी का नया स्तंभ बताया। उनके अनुसार, यह साझेदारी केवल सरकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र, बहुलतावाद और खुली अर्थव्यवस्था के उन साझा मूल्यों पर आधारित है जो दोनों पक्षों को एक सूत्र में पिरोते हैं।
इस शिखर वार्ता के दौरान सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (FTA) रही है। राष्ट्रपति मुर्मू ने इस समझौते के साथ-साथ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी तथा मोबिलिटी सहयोग फ्रेमवर्क को भविष्य की दिशा तय करने वाला बताया। उन्होंने रेखांकित किया कि ये समझौते न केवल दो व्यापारिक निकायों के बीच का अनुबंध हैं, बल्कि ये दोनों क्षेत्रों के लोगों और व्यवसायों के जीवन में सकारात्मक और क्रांतिकारी बदलाव लाने का माध्यम बनेंगे। राष्ट्रपति भवन की ओर से आधिकारिक रूप से साझा की गई जानकारी में भी यह स्पष्ट किया गया कि इन समझौतों से दोनों ओर के नागरिकों के लिए अवसरों के नए द्वार खुलेंगे और भारत-ईयू संबंधों का भविष्य पहले से कहीं अधिक उज्जवल होगा।
इसी कड़ी में, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने भी दिल्ली में यूरोपीय संघ के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान उपराष्ट्रपति ने विशेष रूप से मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने इस समझौते को भारत-ईयू रिश्तों के इतिहास में एक ‘महत्वपूर्ण मील का पत्थर’ करार दिया। उपराष्ट्रपति कार्यालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, चर्चा के दौरान दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि यह व्यापारिक गठबंधन भारत और यूरोप के बीच की साझेदारी को एक अभूतपूर्व गति प्रदान करेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि इससे न केवल बड़े उद्योगों को लाभ होगा, बल्कि छोटे और मध्यम उद्यमों के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी रोजगार और समृद्धि के नए रास्ते बनेंगे।
यह कूटनीतिक हलचल इसलिए भी विशेष रही क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष निमंत्रण पर यूरोपीय परिषद और आयोग के अध्यक्ष भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। 25 से 27 जनवरी के बीच हुए इस दौरे का सबसे बड़ा परिणाम ‘भारत-ईयू संयुक्त व्यापक रणनीतिक एजेंडा 2030’ को अपनाया जाना रहा। यह एजेंडा भविष्य के सहयोग के लिए एक विस्तृत रोडमैप पेश करता है। इस रणनीतिक दस्तावेज को पांच प्रमुख आधारों पर तैयार किया गया है, जो आने वाले वर्षों में सहयोग की दिशा और दशा तय करेंगे।
पहला प्रमुख आधार समृद्धि और सततता का है, जिसके तहत दोनों पक्ष पर्यावरण के अनुकूल विकास और आर्थिक मजबूती के लिए मिलकर काम करेंगे। दूसरा आधार प्रौद्योगिकी और नवाचार को बनाया गया है, जिसमें उभरती हुई तकनीकों और शोध कार्यों में एक-दूसरे का सहयोग करने का संकल्प लिया गया है। तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ सुरक्षा और रक्षा का है, जो बदलते वैश्विक परिवेश में रक्षा सहयोग और रणनीतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देगा। चौथा स्तंभ कनेक्टिविटी और वैश्विक चुनौतियों से निपटने का है, जिसमें बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं पर साझा रुख अपनाने की बात कही गई है। अंतिम और पांचवां स्तंभ कौशल विकास, मोबिलिटी, व्यवसाय और लोगों के बीच संबंधों (पीपल-टू-पीपल कांटेक्ट) पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य प्रतिभाओं के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक जुड़ाव को और प्रगाढ़ बनाना है।
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब यूरोपीय संघ को केवल एक व्यापारिक भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है। वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती धमक और यूरोपीय संघ की रणनीतिक स्वायत्तता की आवश्यकता ने दोनों को एक-दूसरे के करीब ला दिया है। मुक्त व्यापार समझौता और रक्षा सहयोग इस बात का प्रमाण हैं कि दोनों पक्ष अब पुरानी हिचकिचाहट को छोड़कर एक-दूसरे की क्षमताओं पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं। यह ऐतिहासिक दौरा और इसमें लिए गए निर्णय न केवल भारत की विदेश नीति की सफलता को दर्शाते हैं, बल्कि एक बहुध्रुवीय विश्व में स्थिरता और शांति की नई उम्मीद भी जगाते हैं।