भरण-पोषण और वैवाहिक विवादों में बड़ी राहत: पत्नी को पति की आय की जानकारी देना अनिवार्य, सीआईसी का ऐतिहासिक फैसला
नई दिल्ली: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (मेंटेनेंस) के मुकदमों के संदर्भ में एक ऐसा महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जो आने वाले समय में हजारों महिलाओं के लिए कानूनी लड़ाई को आसान बना सकता है। आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि कोई पत्नी अपने पति की आय की सामान्य जानकारी मांगती है, तो उसे ‘निजता’ या ‘गोपनीयता’ का हवाला देकर रोका नहीं जा सकता। सूचना आयुक्त विनोद कुमार तिवारी द्वारा दिए गए इस आदेश ने यह साफ कर दिया है कि वैवाहिक विवादों के मामलों में पति की आय का विवरण केवल व्यक्तिगत जानकारी नहीं रह जाता, बल्कि यह न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक आवश्यक आधार बन जाता है।
यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक महिला ने सूचना का अधिकार (RTI) के तहत आयकर विभाग से अपने पति के पिछले पांच वर्षों की आय का विवरण मांगा था। महिला का तर्क था कि उसका पति अदालत में अपनी वास्तविक आय को कम करके दिखा रहा है ताकि उसे उचित भरण-पोषण (मेंटेनेंस) देने से बच सके। शुरुआत में, आयकर विभाग ने इस आरटीआई आवेदन को खारिज कर दिया था। विभाग ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(जे) का सहारा लिया, जो किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी को तीसरे पक्ष के साथ साझा करने से रोकती है। विभाग का कहना था कि आयकर रिटर्न एक व्यक्तिगत दस्तावेज है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
आयकर विभाग के इस फैसले के खिलाफ महिला ने केंद्रीय सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने मामले की संवेदनशीलता और न्यायिक निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए विभाग के तर्कों को दरकिनार कर दिया। सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि जब एक कानूनी रूप से विवाहित पत्नी अपने जीवन-यापन और न्याय के लिए पति की आय का विवरण मांगती है, तो यह मामला केवल ‘व्यक्तिगत जानकारी’ तक सीमित नहीं रह जाता। यह जानकारी न्यायिक प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा बन जाती है और पत्नी के जीवन के अधिकार से जुड़ जाती है। आयोग ने कहा कि गोपनीयता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे न्याय के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया जा सकता।
हालांकि, आयोग ने इस आदेश के साथ कुछ स्पष्ट दिशा-निर्देश और मर्यादाएं भी तय की हैं। सीआईसी ने स्पष्ट किया कि आयकर विभाग को केवल पति की ‘कुल आय’ या ‘शुद्ध कर योग्य आय’ की सामान्य जानकारी साझा करने की अनुमति है। आयोग ने यह साफ कर दिया कि आयकर रिटर्न (ITR) की पूरी कॉपी, निवेश के विवरण, बैंक खातों की जानकारी या अन्य संवेदनशील निजी विवरण साझा नहीं किए जाएंगे। इसका उद्देश्य यह है कि पति की निजता का पूर्ण उल्लंघन न हो, लेकिन पत्नी को वह आधार मिल सके जिसके जरिए वह अदालत में अपनी उचित भरण-पोषण की मांग को साबित कर सके।
इस आदेश का क्रियान्वयन करने के लिए कुछ शर्तें भी रखी गई हैं। यदि कोई महिला ऐसी जानकारी मांगती है, तो उसे यह साबित करना होगा कि वह संबंधित व्यक्ति की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। इसके लिए उसे विवाह का प्रमाण पत्र या अदालत में चल रहे वैवाहिक विवाद या भरण-पोषण के मुकदमे से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज पेश करने होंगे। एक बार ये दस्तावेज सत्यापित हो जाने के बाद, आयकर विभाग को संबंधित व्यक्ति की आय की सामान्य जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन महिलाओं के लिए गेम-चेंजर साबित होगा जो अक्सर अदालतों में यह साबित नहीं कर पातीं कि उनके पति की वास्तविक वित्तीय स्थिति क्या है। अक्सर देखा गया है कि वैवाहिक विवादों के दौरान पति अपनी संपत्ति और आय को छिपाने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाते हैं, जिससे पत्नियों और बच्चों को उनके वाजिब हक से वंचित रहना पड़ता है। सीआईसी के इस आदेश के बाद, अब पत्नियां सीधे आयकर विभाग के डेटा का उपयोग करके अदालत में पति की आर्थिक स्थिति का सच सामने ला सकेंगी।
यह निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है। आयोग ने इस बात को स्वीकार किया है कि वैवाहिक संबंधों में वित्तीय पारदर्शिता का अभाव अक्सर कानूनी प्रक्रियाओं को लंबा खींचता है। जब आय की सटीक जानकारी उपलब्ध होगी, तो अदालतों के लिए भरण-पोषण की राशि तय करना आसान और त्वरित हो जाएगा। इससे न केवल न्यायिक बोझ कम होगा, बल्कि पीड़ित पक्ष को समय पर आर्थिक सहायता भी मिल सकेगी।
सूचना का अधिकार अधिनियम की व्याख्या करते हुए आयोग ने यह संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाना है, न कि तकनीकी खामियों के पीछे छिपकर जानकारी को रोकना। यह फैसला पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों को वैवाहिक और पारिवारिक कानूनों के दायरे में मजबूती से स्थापित करता है।