बीएमसी चुनाव 2026: देश की सबसे अमीर महानगरपालिका के लिए मतदान शुरू, ठाकरे ब्रांड और महायुति के बीच ‘आर-पार’ की जंग
मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई आज अपने भविष्य का फैसला कर रही है। गुरुवार सुबह से ही बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के 227 वार्डों के लिए मतदान की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह केवल एक नगर निकाय का चुनाव नहीं है, बल्कि इसे ‘मुंबई का दंगल’ कहा जा रहा है, क्योंकि बीएमसी दुनिया के सबसे धनी स्थानीय निकायों में से एक है। 74 हजार करोड़ रुपये से अधिक के सालाना बजट वाली इस संस्था पर कब्जे का अर्थ है—मुंबई की धड़कन और उसकी असीमित आर्थिक शक्ति पर नियंत्रण। आज का दिन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए किसी ‘सुपर थर्सडे’ से कम नहीं है, क्योंकि बीएमसी के साथ-साथ राज्य की कुल 29 अन्य महानगरपालिकाओं के लिए भी वोट डाले जा रहे हैं।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2026 के ये चुनाव महाराष्ट्र की सत्ता का सेमीफाइनल हैं। एक तरफ जहां उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी अपनी विरासत बचाने की जद्दोजहद में है, वहीं भाजपा नीत महायुति ‘मिशन मुंबई’ के जरिए दशकों पुराने समीकरणों को बदलने के लिए तैयार खड़ी है।
सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र: क्यों अहम है बीएमसी का बजट और ताकत?
बीएमसी के चुनाव की अहमियत को समझने के लिए इसके वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। बीएमसी का वार्षिक बजट 74 हजार करोड़ रुपये से अधिक है, जो देश के कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी ज्यादा है। कुछ साल पहले तक तो स्थिति यह थी कि बीएमसी का खर्च दिल्ली की राज्य सरकार के बजट को भी पीछे छोड़ देता था। मुंबई की रगों में दौड़ने वाला पानी, सड़कों का जाल, एशिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य ढांचा और हजारों स्कूल इसी संस्था के नियंत्रण में आते हैं।
यही कारण है कि बीएमसी को ‘मिनी मंत्रालय’ कहा जाता है। जिस पार्टी का झंडा बीएमसी मुख्यालय पर लहराता है, वह पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। मुंबई जैसे महानगर में बुनियादी सुविधाओं का प्रबंधन सीधे तौर पर आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है, इसलिए राजनीतिक दल यहां सत्ता पाने के लिए अपनी पूरी मशीनरी झोंक देते हैं। इस बार 15,931 उम्मीदवार मैदान में हैं, जो बीएमसी समेत 29 नगर निगमों में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
ठाकरे ब्रांड की अग्निपरीक्षा: उद्धव और राज का ऐतिहासिक गठबंधन
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प और चर्चा का केंद्र ‘ठाकरे बंधु’ हैं। शिवसेना के इतिहास में यह पहली बार है जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की ताकत एक साथ एक ही मोर्चे पर खड़ी है। अविभाजित शिवसेना ने लगभग ढाई दशकों तक बीएमसी पर राज किया था, लेकिन जून 2022 में पार्टी के विभाजन के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल गईं। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने शिवसेना को दो गुटों में बांट दिया, जिससे ठाकरे परिवार के वर्चस्व को सीधी चुनौती मिली।
अब, ‘मराठी मानुस’ के वोटों का बिखराव रोकने के लिए उद्धव ठाकरे (शिवसेना यूबीटी) और राज ठाकरे (मनसे) ने हाथ मिलाया है। यह गठबंधन न केवल एक राजनीतिक मजबूरी है, बल्कि ‘ठाकरे’ उपनाम की साख बचाने की लड़ाई भी है। मुंबई की जनता के लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ठाकरे बंधुओं की भावनात्मक अपील भाजपा की संगठनात्मक शक्ति और एकनाथ शिंदे के ‘काम करने वाली सरकार’ के नैरेटिव पर भारी पड़ती है। यदि यह गठबंधन सफल होता है, तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी।
महायुति की रणनीति: भाजपा और शिंदे सेना का नया समीकरण
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली ‘महायुति’ ने इस बार मुंबई के लिए एक नई और चौंकाने वाली बिसात बिछाई है। रणनीति के तहत, महायुति ने अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी को मुंबई निकाय चुनाव के गठबंधन से बाहर रखा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह कदम एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना चाहती हैं कि मुंबई में मुकाबला सीधे तौर पर ‘हिंदुत्व’ और ‘मराठी गौरव’ के इर्द-गिर्द केंद्रित रहे।
अजित पवार को बाहर रखकर महायुति की कोशिश उन मतदाताओं को साधने की है जो कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन करते हैं या जो गैर-हिंदू मतों के ध्रुवीकरण को लेकर संशय में रहते हैं। भाजपा इस चुनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल और मुंबई के बुनियादी ढांचे (जैसे कोस्टल रोड और मेट्रो जाल) के नाम पर लड़ रही है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के लिए भी यह चुनाव साबित करने का मौका है कि वे ही बालासाहेब ठाकरे के असली उत्तराधिकारी हैं।
विपक्ष का बिखराव और त्रिकोणीय मुकाबले की आहट
महाविकास आघाड़ी (एमवीए) के मोर्चे पर इस बार दरार साफ नजर आ रही है। कांग्रेस ने मुंबई में किसी भी गठबंधन का हिस्सा बनने के बजाय अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कांग्रेस का यह कदम ‘एकला चलो’ की नीति के तहत अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि विपक्ष के वोटों का यह बिखराव सीधे तौर पर महायुति को फायदा पहुंचा सकता है।
कांग्रेस के अलग होने से कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हो गया है। जहां एक तरफ महायुति और ठाकरे गठबंधन आमने-सामने हैं, वहीं कांग्रेस की मौजूदगी सेक्युलर वोटों को बांटने का काम कर सकती है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी और अन्य छोटे दल भी मुंबई की चुनावी लड़ाई में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
शहरी मतदाताओं का मूड: क्या हैं मुख्य मुद्दे?
मुंबई का मतदाता इस बार केवल पहचान की राजनीति पर वोट नहीं दे रहा है। सड़कों पर गड्ढे, मानसून के दौरान जलभराव (वॉटर लॉगिंग), बढ़ती महंगाई, और आवास की समस्या इस चुनाव के मुख्य मुद्दे बनकर उभरे हैं। बीएमसी के पास अपार संपत्ति होने के बावजूद भ्रष्टाचार के आरोपों ने पिछले कुछ सालों में इसकी छवि को नुकसान पहुंचाया है। महायुति ने जहां पिछले 25 वर्षों के ‘कुशासन’ और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया है, वहीं ठाकरे गुट केंद्र सरकार पर मुंबई के उद्योगों को गुजरात ले जाने का आरोप लगाकर ‘मुंबई के अपमान’ का कार्ड खेल रहा है।
युवा मतदाता तकनीकी सुविधाओं, डिजिटल प्रशासन और बेहतर सार्वजनिक परिवहन की उम्मीद कर रहे हैं। दक्षिण मुंबई से लेकर उपनगरों तक, हर इलाके की समस्याएं अलग हैं और उम्मीदवारों ने अपने-अपने क्षेत्रों में ‘लोकल’ वादों की झड़ी लगा दी है।
नतीजों के संकेत: महाराष्ट्र की भावी राजनीति का आईना
बीएमसी के ये नतीजे केवल यह नहीं बताएंगे कि मुंबई का मेयर कौन होगा, बल्कि इनसे यह भी साफ हो जाएगा कि महाराष्ट्र की जनता ने शिवसेना के विभाजन को किस तरह स्वीकार किया है। अगर ठाकरे बंधु बहुमत हासिल करने में सफल रहते हैं, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ी संजीवनी होगी और 2029 के विधानसभा चुनावों के लिए विपक्ष को एक नया उत्साह मिलेगा।
वहीं, यदि भाजपा और शिंदे गुट बीएमसी की सत्ता से ठाकरे परिवार को बेदखल कर देते हैं, तो यह ‘ठाकरे ब्रांड’ के अंत की शुरुआत मानी जा सकती है और भाजपा का मुंबई पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो जाएगा। कुल मिलाकर, आज का मतदान यह तय करेगा कि देश की सबसे बड़ी तिजोरी की चाबी किसके हाथ में होगी और मायानगरी मुंबई का अगला सुल्तान कौन बनेगा।