• March 18, 2026

तमिलनाडु विधानसभा में संवैधानिक संकट: राज्यपाल आरएन रवि ने बीच में छोड़ा सदन, स्टालिन सरकार के साथ तल्खी बढ़ी

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर राजभवन और मुख्यमंत्री आवास के बीच का टकराव चरम पर पहुंच गया है। मंगलवार को विधानसभा के साल के पहले सत्र की शुरुआत बेहद हंगामेदार रही, जब राज्यपाल आरएन रवि ने अपना पारंपरिक उद्घाटन भाषण पूरा किए बिना ही सदन छोड़कर बाहर चले गए। राज्यपाल ने डीएमके सरकार पर राष्ट्रगान का अपमान करने, भाषण में असत्य तथ्यों को शामिल करने और संवैधानिक कर्तव्यों की अनदेखी करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्यपाल की इस कार्रवाई को संसदीय परंपराओं का अपमान और शिष्टाचार का खुला उल्लंघन करार दिया है।

सदन में हाई-वोल्टेज ड्रामा और वॉकआउट

विधानसभा का सत्र शुरू होते ही उम्मीद की जा रही थी कि राज्यपाल सरकार द्वारा तैयार किया गया पारंपरिक संबोधन पढ़ेंगे, लेकिन माहौल तब तनावपूर्ण हो गया जब राज्यपाल ने भाषण की शुरुआत तो की, लेकिन कुछ ही पलों में उन्होंने उसे पढ़ने से मना कर दिया। राज्यपाल ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि वे इस भाषण को पढ़कर असत्य को बढ़ावा नहीं दे सकते। सदन के भीतर स्थिति तब और बिगड़ गई जब सभापति एम. अप्पावु ने राज्यपाल से विधानसभा के नियमों और स्थापित प्रथाओं का पालन करने का अनुरोध किया। राज्यपाल ने आरोप लगाया कि उनका माइक बार-बार बंद किया गया और उन्हें अपनी बात रखने की अनुमति नहीं दी गई। राष्ट्रगान और सदन की गरिमा को लेकर उपजे इस विवाद के बीच राज्यपाल गुस्से में कक्ष से बाहर निकल गए, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।

राजभवन का स्पष्टीकरण: क्यों छोड़ा राज्यपाल ने सदन?

सदन से बाहर जाने के कुछ ही समय बाद राजभवन ने एक विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी कर राज्यपाल के इस कदम के पीछे के कारणों को स्पष्ट किया। राजभवन के अनुसार, राज्यपाल ने महसूस किया कि राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए भाषण में कई ऐसी बातें शामिल थीं जो तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक थीं। राज्यपाल ने विशेष रूप से दलितों के खिलाफ बढ़ रहे अत्याचारों और दलित महिलाओं के साथ यौन हिंसा के मामलों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राज्य में अपराध के ये गंभीर मुद्दे और युवाओं में बढ़ता ड्रग्स का दुरुपयोग सरकार के एजेंडे से गायब हैं।

विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि शिक्षा व्यवस्था की गिरती गुणवत्ता, हजारों ग्राम पंचायतों में चुनाव न होना और MSME सेक्टर की बदहाली जैसे महत्वपूर्ण विषयों को भाषण में जगह नहीं दी गई थी। राज्यपाल ने मंदिरों के प्रबंधन में कुप्रबंधन और हाई कोर्ट के आदेशों की अवहेलना का मुद्दा भी उठाया। राजभवन ने दावा किया कि राज्यपाल एक संवैधानिक प्रमुख के तौर पर ऐसे भाषण को पढ़ने के लिए बाध्य नहीं हैं जो वास्तविकता से परे हो और जिसमें राष्ट्रगान के प्रति अपेक्षित सम्मान की कमी दिखाई दे रही हो।

मुख्यमंत्री स्टालिन का पलटवार: ‘राज्यपाल की आवश्यकता नहीं’

राज्यपाल के वॉकआउट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे लोकतंत्र की अवमानना बताया। मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि सरकार द्वारा तैयार किया गया भाषण कैबिनेट द्वारा अनुमोदित होता है और राज्यपाल को उसमें अपनी व्यक्तिगत राय जोड़ने या तथ्यों को बदलने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। स्टालिन ने आरोप लगाया कि राज्यपाल आरएन रवि जानबूझकर सरकार के कामकाज में बाधा डाल रहे हैं और उनका आचरण एक संघीय ढांचे के विरुद्ध है।

मुख्यमंत्री ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि हालांकि उनकी पार्टी डीएमके का वैचारिक स्टैंड रहा है कि राज्यपाल जैसे पद की आवश्यकता नहीं है, फिर भी पूर्व मुख्यमंत्री सीएन अन्नादुरई और एम करुणानिधि ने हमेशा इस पद का सम्मान किया है। स्टालिन ने कहा कि वर्तमान सरकार भी इसी परंपरा का निर्वाह कर रही है, लेकिन राज्यपाल का व्यवहार शिष्टाचार की सीमाओं को लांघ रहा है। उन्होंने इसे आगामी चुनावों से प्रेरित एक राजनीतिक स्टंट करार दिया।

संवैधानिक शक्तियों और परंपराओं का टकराव

यह तमिलनाडु में पहली बार नहीं है जब राज्यपाल और सरकार के बीच इस तरह का गतिरोध देखा गया हो। पिछले साल भी राज्यपाल रवि ने विधानसभा से वॉकआउट किया था, जिसके बाद काफी विवाद हुआ था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत, राज्यपाल को साल के पहले सत्र में सदन को संबोधित करना होता है। हालांकि, विवाद इस बात पर है कि क्या राज्यपाल भाषण के उन अंशों को छोड़ सकते हैं जिनसे वे सहमत नहीं हैं, या क्या उन्हें सरकार द्वारा दी गई लिखित प्रति को ही पढ़ना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में यह कहा गया है कि राज्यपाल का भाषण राज्य कैबिनेट की सलाह और सहायता का हिस्सा होता है। लेकिन आरएन रवि का तर्क है कि यदि भाषण में संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ या सरासर गलत जानकारी हो, तो वे उसे पढ़ने के लिए विवश नहीं हैं। यह कानूनी और संवैधानिक बहस अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।

राजनीतिक निहितार्थ और आगामी चुनाव

तमिलनाडु में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में राज्यपाल और सत्तारूढ़ डीएमके के बीच का यह संघर्ष राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण हो गया है। विपक्षी दल AIADMK और भाजपा ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार राज्यपाल के माध्यम से अपनी विफलताओं को छिपाना चाहती है, जबकि डीएमके इसे ‘तमिल गौरव’ और ‘राज्य की स्वायत्तता’ पर हमले के रूप में पेश कर रही है।

विधानसभा के भीतर की इस तनातनी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाला सत्र काफी हंगामेदार रहने वाला है। जहां एक ओर मुख्यमंत्री स्टालिन और उनके मंत्री परिषद के सदस्य विपक्ष और राज्यपाल के हमलों का जवाब देने की रणनीति बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्यपाल के कड़े रुख ने सरकार के लिए विधायी कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। राष्ट्रगान के अपमान और माइक बंद करने जैसे आरोपों ने इस विवाद को भावनात्मक मोड़ भी दे दिया है, जो चुनावी रैलियों में गूंज सकता है।

प्रशासनिक गतिरोध की आशंका

राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बढ़ती इस खाई का सीधा असर राज्य के प्रशासनिक कार्यों पर पड़ने की आशंका है। कई महत्वपूर्ण विधेयक जो राजभवन में मंजूरी के इंतजार में हैं, उनमें और देरी हो सकती है। राज्यपाल द्वारा दलित सुरक्षा, ड्रग्स और पंचायत चुनावों जैसे मुद्दों को उठाना सीधे तौर पर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है। यदि यह गतिरोध जारी रहता है, तो राज्य में संवैधानिक मशीनरी के सुचारू संचालन पर संकट मंडरा सकता है।

फिलहाल, पूरा देश तमिलनाडु की इस राजनीतिक उठापटक को देख रहा है। क्या केंद्र सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करेगी या क्या यह मामला एक बार फिर अदालतों के गलियारों तक पहुंचेगा, यह आने वाले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन एक बात साफ है कि तमिलनाडु की विधानसभा में मंगलवार को जो हुआ, उसने भारतीय लोकतंत्र में राज्यपाल और चुनी हुई सरकार के बीच के संतुलन पर फिर से बहस छेड़ दी है।

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