• January 31, 2026

कांग्रेस में ‘ऑल इज वेल’: राहुल गांधी और खरगे से मिले शशि थरूर, क्या सुलझ गए मतभेदों के तार?

नई दिल्ली: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर पिछले काफी समय से सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब शांत होती नजर आ रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने गुरुवार को संसद भवन में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से एक महत्वपूर्ण मुलाकात की। इस संक्षिप्त लेकिन रणनीतिक रूप से अहम बैठक के बाद थरूर के चेहरे पर मुस्कान और उनके सधे हुए बयानों ने यह संकेत दे दिया है कि पार्टी नेतृत्व और उनके बीच जमी बर्फ अब पिघल चुकी है। बैठक के बाद बाहर निकलते समय थरूर ने मीडिया से मुखातिब होते हुए संक्षिप्त शब्दों में कहा, “सब ठीक है।”

शशि थरूर ने इस पूरी चर्चा को अत्यंत ‘रचनात्मक और सकारात्मक’ करार दिया। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि पार्टी नेतृत्व के साथ उनकी बातचीत बहुत अच्छी रही और अब वे सभी एक ही धरातल पर हैं। थरूर का यह बयान उन कयासों और अफवाहों पर पूर्णविराम लगाने के लिए काफी माना जा रहा है, जिनमें उनके कांग्रेस छोड़ने या भाजपा के करीब जाने की बातें कही जा रही थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी के भीतर कुछ वैचारिक विमर्श जरूर थे, लेकिन अब वे और नेतृत्व एक ही दिशा में आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह सहमत हैं।

दरअसल, यह विवाद पिछले कुछ महीनों से लगातार गहराता जा रहा था। थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच तनाव की खबरें तब सार्वजनिक हुईं जब उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार किया कि उनके कुछ मुद्दे हैं जिन्हें वे पार्टी के आंतरिक मंच पर उठाना चाहते हैं। थरूर, जो पिछले 17 वर्षों से कांग्रेस के साथ निष्ठापूर्वक जुड़े हुए हैं, ने बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि उन्होंने कभी भी संसद के भीतर या बाहर पार्टी की आधिकारिक लाइन या अनुशासन का उल्लंघन नहीं किया है। बावजूद इसके, उनके कुछ स्वतंत्र बयानों और लेखों ने पार्टी के भीतर बेचैनी पैदा कर दी थी।

विवाद की शुरुआत उस वक्त हुई जब थरूर पार्टी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में शामिल नहीं हुए थे। हालांकि, उन्होंने बाद में स्पष्टीकरण दिया था कि वे पहले से निर्धारित एक साहित्य उत्सव में भाग लेने गए थे और इसकी सूचना उन्होंने पार्टी नेतृत्व को समय रहते दे दी थी। इसके तुरंत बाद, कोच्चि में पार्टी के एक कार्यक्रम के दौरान उनके साथ हुए कथित खराब व्यवहार की खबरों ने आग में घी डालने का काम किया। हालांकि उस समय थरूर ने इस पर चुप्पी साधे रखी थी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे नेतृत्व के प्रति उनके मोहभंग के रूप में देखा गया।

पार्टी के भीतर असली संकट तब खड़ा हुआ जब पिछले साल अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकट प्रबंधन की खुलकर तारीफ कर दी थी। कांग्रेस के कई दिग्गजों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और इसे पार्टी की विचारधारा के विरुद्ध माना था। इसके तुरंत बाद भाजपा द्वारा एक अंतरदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने के लिए थरूर को आमंत्रित करना और उनका उस निमंत्रण को स्वीकार कर लेना, संदेह के घेरे में आ गया। चूंकि उस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस का कोई अन्य सदस्य शामिल नहीं था, इसलिए सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक थरूर के भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई थीं।

तनाव की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब थरूर ने प्रधानमंत्री के एक भाषण की सोशल मीडिया पर सराहना की और उसके बाद “भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय है” शीर्षक से एक विवादास्पद लेख लिखा। इस लेख में वंशवादी राजनीति की कड़ी आलोचना की गई थी, जिसे परोक्ष रूप से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर हमले के रूप में देखा गया। इस लेख से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे सहित पार्टी का एक बड़ा धड़ा काफी नाराज बताया जा रहा था। हालांकि, थरूर ने हर बार यही तर्क दिया कि उनकी टिप्पणियां किसी राजनीतिक सौदेबाजी या रणनीति का हिस्सा नहीं थीं, बल्कि वे राष्ट्रहित और स्वस्थ लोकतंत्र की भावना से प्रेरित थीं।

थरूर ने हमेशा इस बात का बचाव किया कि प्रधानमंत्री की किसी विशेष कार्य के लिए प्रशंसा करने का अर्थ यह कतई नहीं है कि वे उनके राजनीतिक दल की विचारधारा का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता का संदेश बताया था। अब, राहुल गांधी और खरगे के साथ हुई इस ताजा मुलाकात के बाद राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पार्टी ने थरूर की विशिष्ट शैली और उनके स्वतंत्र विचारों को स्वीकार कर लिया है, जबकि थरूर ने भी पार्टी अनुशासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

कांग्रेस के लिए यह मुलाकात इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि आगामी चुनावों और संसद के मौजूदा सत्र के दौरान पार्टी को एक संगठित विपक्ष के रूप में दिखने की जरूरत है। शशि थरूर जैसे बौद्धिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले नेता की नाराजगी पार्टी को भारी पड़ सकती थी। इस बैठक के बाद अब यह स्पष्ट है कि कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह को पीछे छोड़कर एकजुटता का संदेश देना चाहती है। थरूर का ‘ऑल इज वेल’ कहना केवल एक बयान नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन की एक नई तस्वीर पेश करता है।

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