• January 31, 2026

ऐतिहासिक ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’: भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक महासंधि पर मुहर, सस्ती होंगी लग्जरी कारें

नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच पिछले दो दशकों से चली आ रही आर्थिक रस्साकशी का मंगलवार को एक सुखद और ऐतिहासिक अंत हो गया। करीब 19 वर्षों के लंबे इंतजार, दर्जनों वार्ताओं और कई उतार-चढ़ाव के बाद दोनों पक्षों ने अंततः अपने महत्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दे दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते की विशालता और इसके दूरगामी प्रभावों को देखते हुए इसे “मदर ऑफ ऑल डील्स” (सभी समझौतों की जननी) करार दिया है। इस संधि के लागू होने के साथ ही भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर, विशेषकर लग्जरी कार बाजार में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है, क्योंकि अब यूरोप से आने वाली बेहतरीन गाड़ियां भारतीय उपभोक्ताओं के लिए पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो जाएंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा करते हुए इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बताया। उन्होंने कहा कि यह समझौता दुनिया की दो सबसे बड़ी और परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं के बीच अटूट विश्वास की मिसाल है। पीएम मोदी के अनुसार, यह संधि न केवल द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय सप्लाई चेन को भी मजबूत करेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह एफटीए दुनिया भर के निवेशकों के लिए भारत में बढ़ते भरोसे का प्रतीक है और यह भारत की वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरती साख को पुख्ता करता है।

ऑटो सेक्टर में भूकंप: 110% से घटकर 10% हुआ आयात शुल्क

इस पूरे व्यापार समझौते की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी खबर कारों पर लगने वाले आयात शुल्क (Import Duty) से जुड़ी है। अब तक यूरोपीय देशों से बनकर आने वाली (CBU) कारों पर भारत सरकार 110 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैक्स वसूलती थी, जिसके कारण मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू, फॉक्सवैगन और ऑडी जैसी कंपनियों की गाड़ियां भारत में अपनी वास्तविक कीमत से लगभग दोगुनी दरों पर मिलती थीं।

समझौते के तहत, इस टैक्स को 110 प्रतिशत से घटाकर सीधे 10 प्रतिशत करने का अभूतपूर्व निर्णय लिया गया है। हालांकि, घरेलू उद्योग के हितों की रक्षा के लिए इसमें एक रणनीतिक ‘कैविएट’ यानी शर्त जोड़ी गई है। यह कम टैक्स दर सालाना 2,50,000 गाड़ियों के एक निश्चित कोटे पर ही लागू होगी। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष में यूरोप से आयात होने वाली शुरुआती ढाई लाख कारों पर ही 10 प्रतिशत का रियायती टैक्स लगेगा। इस कोटे के पूरा होने के बाद आयात होने वाली कारों पर सामान्य दरें लागू होंगी। इस कदम से मर्सिडीज-बेंज, रेनो और वॉल्वो जैसी कंपनियों को भारतीय बाजार में अपनी पैठ बढ़ाने का सुनहरा अवसर मिलेगा।

इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) पर सस्पेंस बरकरार

जहाँ एक ओर पेट्रोल और डीजल इंजन वाली कारों के शौकीनों के लिए यह बड़ी खुशखबरी है, वहीं इलेक्ट्रिक वाहन (EV) क्षेत्र के लिए इस समझौते में अभी राहत के द्वार नहीं खुले हैं। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इस ऐतिहासिक डील में इलेक्ट्रिक वाहनों को फिलहाल आयात शुल्क में किसी भी प्रकार की रियायत के दायरे से बाहर रखा गया है। इसका मतलब है कि टेस्ला या अन्य यूरोपीय ईवी दिग्गज कंपनियों को भारतीय बाजार में अपनी गाड़ियां भेजने के लिए अभी भी पुराने और ऊंचे टैक्स स्लैब का ही सामना करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार अपने घरेलू इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण और ‘फेम’ (FAME) जैसी योजनाओं के तहत स्थानीय उत्पादन को संरक्षण देना चाहती है, इसलिए ईवी को इस छूट से अलग रखा गया है।

दो दशक का धैर्य और बदलता व्यापारिक गणित

भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस समझौते की कहानी साल 2007 में शुरू हुई थी। उस समय इसे ‘ब्रॉड-बेस्ड ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट एग्रीमेंट’ (BTIA) के नाम से जाना जाता था। साल 2013 में कई मुद्दों पर असहमति के कारण बातचीत पूरी तरह टूट गई थी और लंबे समय तक ठंडे बस्ते में रही। जून 2022 में दोनों पक्षों ने नई ऊर्जा के साथ इसे दोबारा शुरू किया और अंततः जनवरी 2026 में यह समझौता धरातल पर उतर सका। इस डील के साथ ही भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के बाद तीसरा ऐसा एशियाई देश बन गया है जिसने यूरोपीय संघ के साथ इतना व्यापक और प्रभावशाली व्यापारिक समझौता किया है।

व्यापारिक आंकड़ों की बात करें तो यूरोपीय संघ वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान दोनों के बीच कुल व्यापार 190 अरब डॉलर के पार पहुंच गया, जिसमें माल का व्यापार लगभग 136 अरब डॉलर रहा। अब ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के हस्ताक्षर होने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि अगले पांच वर्षों में यह व्यापारिक आंकड़ा 300 अरब डॉलर के स्तर को छू सकता है। यह समझौता न केवल ऑटोमोबाइल बल्कि टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी सेवाओं के क्षेत्र में भी भारतीय कंपनियों के लिए यूरोप के 27 देशों के द्वार पूरी तरह खोल देगा।

कुल मिलाकर, यह मुक्त व्यापार समझौता भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ की सोच के साथ वैश्विक मुक्त व्यापार के बीच एक संतुलन साधने की कोशिश है। आने वाले दिनों में जब पहली खेप की यूरोपीय कारें 10% टैक्स के साथ भारतीय बंदरगाहों पर उतरेंगी, तब आम उपभोक्ता को इस ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ का असली स्वाद चखने को मिलेगा।

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