असम चुनाव 2026: ‘गमछा’ बनाम ’10 सवाल’, अमित शाह के आरोपों पर कांग्रेस का तीखा पलटवार
डिब्रूगढ़/नई दिल्ली: असम में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राज्य की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप का दौर चरम पर पहुंच गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के असम दौरे ने राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है। डिब्रूगढ़ की एक विशाल जनसभा में जहां अमित शाह ने राहुल गांधी पर असमिया संस्कृति के अपमान का आरोप मढ़ा, वहीं कांग्रेस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए भाजपा सरकार से 10 तीखे सवाल पूछे हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा के 10 साल के शासन ने असम और पूरे पूर्वोत्तर को ‘राजनीतिक रूप से अनाथ’ बना दिया है।
इस विवाद की शुरुआत अमित शाह के उस बयान से हुई जिसमें उन्होंने राहुल गांधी पर असमिया पहचान के प्रतीक ‘गमछा’ का अनादर करने का आरोप लगाया। डिब्रूगढ़ में जनता को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि आज पूरी दुनिया में असम और नॉर्थ-ईस्ट का गमछा सम्मान का प्रतीक बन चुका है, लेकिन राहुल गांधी ने इसका सम्मान नहीं किया। उन्होंने एक विशिष्ट घटना का जिक्र करते हुए दावा किया कि राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘एट होम’ कार्यक्रम में सभी गणमान्य लोगों ने असम का गमछा पहना था, लेकिन राहुल गांधी एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने इसे धारण नहीं किया। शाह ने सवालिया लहजे में पूछा कि राहुल गांधी की पूर्वोत्तर के साथ क्या दुश्मनी है और वे इस क्षेत्र के साथ इतना अन्याय क्यों करते हैं।
गृह मंत्री के इन आरोपों के कुछ ही घंटों बाद कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया और प्रेस ब्रीफिंग के जरिए भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। खेड़ा ने कहा कि गृह मंत्री को प्रतीकों की बात करने के बजाय राज्य की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा को अमित शाह का ‘भूमि-विक्रेता शिष्य’ करार देते हुए 10 सवालों की एक सूची जारी की और भाजपा के पिछले 10 सालों के शासन का हिसाब मांगा।
कांग्रेस का सबसे बड़ा हमला जनजातीय पहचान और आरक्षण को लेकर रहा। पवन खेड़ा ने पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह महीने और मुख्यमंत्री हिमंता ने पांच साल में समाधान का वादा किया था, लेकिन 12 साल बीत जाने के बाद भी कोच-राजबोंगशी, ताई अहोम, मोरान, मतक और चाय बागान के आदिवासी समुदायों को अब तक अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा क्यों नहीं मिल सका है। कांग्रेस ने भाजपा के ‘जाति, माटी, भेती’ (समुदाय, भूमि और आधार) के नारे पर प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने असम के मूल निवासियों की 1.5 लाख बीघा जमीन अपने करीबी लोगों को बेचने की अनुमति देकर राज्य की मिट्टी के साथ विश्वासघात किया है।
बेरोजगारी और पलायन के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब राज्य की जमीन, नदियां और जंगल बेचे जा रहे हैं, तो रोजगार के अवसर कहां हैं। पवन खेड़ा ने पूछा कि असमिया युवा राज्य छोड़कर पलायन करने पर क्यों मजबूर हैं और उन्हें अन्य राज्यों में भेदभाव का सामना क्यों करना पड़ रहा है। इसके साथ ही, मतदाता सूची से लाखों मूल निवासियों के नाम गायब होने और असमिया पहचान के कमजोर होने पर भी कांग्रेस ने सरकार से जवाब मांगा।
चाय बागान मजदूरों की स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को भी कांग्रेस ने चुनावी मुद्दा बनाया। खेड़ा ने सवाल किया कि एक दशक की सत्ता के बाद भी चाय बागान मजदूरों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्यों नहीं है और असम की स्वास्थ्य सेवाएं पड़ोसी राज्यों की तुलना में पिछड़ी क्यों हैं। उन्होंने असम के पानी में बढ़ते प्रदूषण और गुणवत्ता की समस्या को लेकर भी सरकार को घेरा और पूछा कि ‘जड़ी’ (जड़) को कमजोर करने और ‘भेती’ (आधार) को धोखा देने का काम भाजपा सरकार ने क्यों किया।
कांग्रेस ने भाजपा की विदेश नीति को भी असम की सुरक्षा से जोड़ते हुए बड़ा आरोप लगाया। पवन खेड़ा ने कहा कि केंद्र सरकार की विदेश नीति की विफलताओं के कारण बांग्लादेश अब चीन के अधिक करीब आ गया है, जिससे असम के लिए नई सुरक्षा और मानवीय चुनौतियां पैदा हो गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के शासन में असम और पूरा उत्तर पूर्व राजनीतिक रूप से लावारिस और अनाथ महसूस कर रहा है।
गौरतलब है कि असम में इसी साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा के लिए जहां अपना किला बचाने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। गृह मंत्री अमित शाह का एक महीने के भीतर यह दूसरा असम दौरा था, जो यह साफ करता है कि भाजपा के लिए यह चुनाव कितना महत्वपूर्ण है। डिब्रूगढ़ में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने शाह का भव्य स्वागत किया था, लेकिन कांग्रेस के इन 10 सवालों ने सत्ता पक्ष को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में ‘गमछा’ के सम्मान की राजनीति और ‘जमीन-रोजगार’ के सवालों में से असम की जनता किसे प्राथमिकता देती है।