• January 19, 2026

लखनऊ में मतदाता पुनरीक्षण अभियान के बीच मची खलबली: बुजुर्गों से मांगा जा रहा मायके का पता, गायब हुए हजारों नाम

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इन दिनों लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया यानी मतदाता सूची को दुरुस्त करने का काम चल रहा है, लेकिन ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) का यह अभियान आम जनता के लिए राहत के बजाय आफत और हैरानी का सबब बनता जा रहा है। चुनाव आयोग के निर्देश पर जिले भर में चलाए जा रहे इस अभियान के तहत रविवार को जब विभिन्न मतदान केंद्रों पर ड्राफ्ट मतदाता सूची पढ़कर सुनाई गई, तो अव्यवस्थाओं और अजीबोगरीब आपत्तियों का एक ऐसा पिटारा खुला जिसने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्षों से अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे बुजुर्गों को ऐसे नोटिस थमाए जा रहे हैं, जिनकी तर्कसंगत व्याख्या करना बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) के लिए भी मुश्किल हो रहा है। कहीं आधी सदी से शहर में रह रही महिलाओं से उनके मायके का पता मांगा जा रहा है, तो कहीं एक ही छत के नीचे रहने वाले सगे भाई-बहनों में से किसी का नाम सूची से रहस्यमयी ढंग से गायब है।

राजधानी के अलग-अलग इलाकों से आई शिकायतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के नाम पर जमीनी स्तर पर भारी लापरवाही बरती गई है। लखनऊ की सभी नौ विधानसभा सीटों के 4132 मतदान केंद्रों पर रविवार को विशेष दिवस का आयोजन किया गया था, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना था। लेकिन शुद्धता के इस चक्कर में कई पुराने और वास्तविक मतदाताओं के नाम काटने की तैयारी ने लोगों के बीच डर और गुस्से का माहौल पैदा कर दिया है। प्रशासन का दावा है कि यह प्रक्रिया सूची को अपडेट करने के लिए है, लेकिन जिस तरह के नोटिस जारी किए जा रहे हैं, उसने लोगों को कतारों में खड़े होने पर मजबूर कर दिया है।

बुजुर्ग मतदाताओं के साथ अजीबोगरीब ‘सर्वे’: 25 साल बाद मायके की खोज

इस अभियान के दौरान सबसे चौंकाने वाला मामला मकबूलगंज इलाके से सामने आया है, जो सरकारी मशीनरी की संवेदनहीनता और तर्कहीनता को उजागर करता है। यहां की निवासी नेहा जायसवाल ने प्रशासन के नोटिस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए बताया कि उनकी 64 वर्षीय मां, पुष्पा जायसवाल पिछले 25 वर्षों से लगातार इसी क्षेत्र में वोट डाल रही हैं। उनके पास वैध वोटर आईडी कार्ड है और वह दर्जनों चुनावों में अपनी उंगली पर स्याही लगवा चुकी हैं। लेकिन इस बार बीएलओ ने उन्हें एक नोटिस थमा दिया है, जिसमें उनसे उनके ‘मायके’ की जानकारी मांगी गई है। एक बुजुर्ग महिला, जो अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ससुराल और लखनऊ के इसी मोहल्ले में बिता चुकी है, उससे उसके मायके का विवरण मांगना न केवल हास्यास्पद है बल्कि अपमानजनक भी प्रतीत होता है।

यह अकेले पुष्पा जायसवाल की कहानी नहीं है। शहर के कई अन्य हिस्सों से भी ऐसी खबरें आ रही हैं जहां दशकों पुराने निवासियों से ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं जो आमतौर पर नए मतदाताओं से मांगे जाते हैं। लोगों का सवाल है कि यदि कोई व्यक्ति पिछले कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदान कर चुका है और उसका पता नहीं बदला है, तो अचानक उसकी नागरिकता या निवास की पात्रता पर इस तरह का संदेह क्यों किया जा रहा है? विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा माइग्रेशन और सॉफ्टवेयर मैपिंग की त्रुटियों के कारण पुराने मतदाताओं का डेटा ‘फ्लैग’ हो रहा है, जिसे दुरुस्त करने के बजाय बीएलओ सीधे नोटिस जारी कर औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।

एक ही परिवार में बंटवारा: कहीं नाम है तो कहीं लापता

मतदाता पुनरीक्षण अभियान की एक और बड़ी खामी उन परिवारों में देखने को मिली है, जिन्होंने नए नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया था। फूलबाग क्षेत्र की निवासी रहमीन की आपबीती इसका सटीक उदाहरण है। रहमीन ने बताया कि उन्होंने अपनी दो अन्य बहनों के साथ मिलकर मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म भरा था। प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद थी, लेकिन जब रविवार को सूची पढ़ी गई, तो पता चला कि उनकी मझली बहन यासमीन का नाम सूची से गायब है, जबकि बाकी दो बहनों के नाम दर्ज हो गए हैं। प्रशासन अब उन्हें दोबारा फॉर्म भरने की सलाह दे रहा है, जिससे आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि पहली बार की गई मेहनत और जमा किए गए दस्तावेज विभाग की फाइलों में कहीं खो गए हैं।

इसी तरह की शिकायतें एमा थॉमस इंटर कॉलेज बूथ पर भी देखने को मिलीं। यहां फरहत नाज नाम की महिला ने बताया कि उन्होंने अपना आवेदन पूरी तरह सही भरा था और ऑनलाइन स्टेटस भी संतोषजनक था। इसके बावजूद उन्हें बीएलओ का फोन आया और नोटिस थमाते हुए फिर से वही प्रक्रिया दोहराने को कहा गया। यह स्थिति दर्शाती है कि डिजिटल इंडिया के दौर में भी फाइलों और फॉर्मों का भौतिक सत्यापन किस कदर जटिलताओं से भरा हुआ है। लोग एक ही काम के लिए बार-बार दफ्तरों और बूथों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं, जिससे इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति उनका उत्साह कम हो रहा है।

बूथों की जमीनी हकीकत: सुबह पसरा रहा सन्नाटा

रविवार की छुट्टी के बावजूद लखनऊ के मतदान केंद्रों पर वह हलचल नहीं दिखी जिसकी प्रशासन को उम्मीद थी। सुबह 10 बजे से जब अभियान शुरू हुआ, तो इस्लामिया इंटर कॉलेज सहित जिले के अधिकांश बूथों पर सन्नाटा पसरा रहा। कड़ाके की ठंड और जानकारी के अभाव के कारण लोग दोपहर तक घरों से बाहर नहीं निकले। कई केंद्रों पर तो स्थिति यह थी कि बीएलओ और सहायक कर्मचारी खाली कुर्सियों पर बैठकर मतदाताओं का इंतजार करते रहे। 12:30 बजे तक स्थिति बेहद सुस्त थी, लेकिन दोपहर के भोजन के बाद धीरे-धीरे लोगों की आमद शुरू हुई।

दोपहर बाद जब लोगों ने बूथों पर पहुंचकर ड्राफ्ट सूची में अपना और अपने परिवार का नाम खोजना शुरू किया, तब शिकायतों का सिलसिला भी तेज हो गया। बीएलओ द्वारा सूची पढ़कर सुनाने के दौरान कई लोगों ने बीच में ही टोकते हुए अपने नाम कटने या गलत दर्ज होने पर आपत्ति जताई। हालांकि, किसी भी बूथ पर भारी भीड़ नहीं देखी गई, लेकिन जो लोग वहां पहुंचे थे, उनके मन में शंकाएं और सवाल अधिक थे। प्रशासन की ओर से नए मतदाताओं को फॉर्म-6 उपलब्ध कराए गए, लेकिन पुराने मतदाताओं के नाम कटने के डर ने इस पूरी प्रक्रिया पर एक साया डाल दिया है।

प्रशासनिक सफाई: क्यों भेजे गए हजारों नोटिस?

बढ़ते विवाद और जनता के आक्रोश को देखते हुए सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी अभय किशोर सिंह ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। उनके मुताबिक, एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान उन सभी फॉर्मों की गहन जांच की गई है जिनमें जानकारी अधूरी थी या जो 2003 की आधार मतदाता सूची से मेल नहीं खा रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि नोटिस केवल उन्हीं लोगों को दिए गए हैं जिनकी ‘मैपिंग’ नहीं हो पा रही थी या जिनकी प्रविष्टियां संदिग्ध लग रही थीं। प्रशासन का तर्क है कि 2003 की सूची को आधार बनाकर डेटा को डिजिटल रूप से सिंक किया जा रहा है, और इस प्रक्रिया में जो नाम पुराने रिकॉर्ड में नहीं मिल रहे, उन्हें दोबारा सत्यापित करना कानूनी मजबूरी है।

जिला प्रशासन ने मतदाताओं को आश्वासन दिया है कि नोटिस मिलने का मतलब यह कतई नहीं है कि उनका नाम काट दिया गया है। यह केवल एक सत्यापन प्रक्रिया है। अभय किशोर सिंह ने कहा कि यदि मतदाता मांगी गई सामान्य जानकारी या दस्तावेज उपलब्ध करा देते हैं, तो उनका नाम सूची में सुरक्षित रहेगा। हालांकि, जनता का तर्क है कि प्रशासन को यह सत्यापन घर-घर जाकर करना चाहिए था, न कि बुजुर्गों को नोटिस भेजकर उन्हें दफ्तरों में बुलाना चाहिए। प्रशासन का दावा है कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मृतक, स्थानांतरित, अनुपस्थित और दोहरी प्रविष्टि वाले ‘फर्जी’ मतदाताओं को हटाना है ताकि आने वाले चुनावों में केवल वास्तविक मतदाता ही हिस्सा ले सकें।

आंकड़ों की जुबानी: अभियान की सफलता या चुनौती?

जिला निर्वाचन अधिकारी विशाख जी ने रविवार शाम को पूरे जिले के आंकड़े जारी किए। उनके अनुसार, लखनऊ की सभी नौ विधानसभा क्षेत्रों में रविवार को एक बड़ा अभियान चलाया गया। इस दौरान बीएलओ ने कुल 8,460 फॉर्म प्राप्त किए, जो यह दर्शाता है कि लोग धीरे-धीरे जागरूक हो रहे हैं। इन प्राप्त आवेदनों में सबसे बड़ी संख्या नए मतदाताओं की है। फॉर्म-6 (नया नाम जोड़ने) के लिए 1,665 आवेदन आए हैं, जबकि फॉर्म-8 (नाम या पते में संशोधन) के लिए 83 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में उन लोगों के नाम हटाए गए हैं जो अब उस क्षेत्र में नहीं रहते या जिनकी मृत्यु हो चुकी है।

प्रशासन इसे एक सफल अभियान मान रहा है, लेकिन 8,460 फॉर्मों की यह संख्या लखनऊ जैसे बड़े जिले की आबादी के लिहाज से काफी कम मानी जा रही है। विशेष रूप से तब जब हजारों पुराने मतदाताओं के नाम कटने की तलवार लटकी हुई है। आने वाले दिनों में यह अभियान और तेज होगा, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उन वास्तविक मतदाताओं का भरोसा जीतना है जिन्हें अपनी ही पहचान साबित करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यदि प्रशासन ने इन विसंगतियों को जल्दी दूर नहीं किया, तो आगामी चुनावों में मतदान प्रतिशत पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *