• January 19, 2026

मुंबई के रण में ‘होटल पॉलिटिक्स’: बीएमसी मेयर पद के लिए बिछी सियासी बिसात, संजय राउत का शिंदे गुट पर तीखा तंज

मुंबई: देश की सबसे अमीर महानगरपालिका, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के चुनाव परिणामों ने मुंबई की राजनीति में एक ऐसी हलचल पैदा कर दी है, जिसकी गूँज अब पांच सितारा होटलों के गलियारों तक सुनाई दे रही है। 227 सीटों वाली बीएमसी में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण अब ‘मेयर’ की कुर्सी के लिए शह और मात का खेल शुरू हो गया है। इस बीच, शिवसेना (यूबीटी) के फायरब्रांड नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने सत्ताधारी गठबंधन, विशेषकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना पर जोरदार हमला बोला है। शिंदे गुट द्वारा अपने नवनिर्वाचित पार्षदों को होटल में शिफ्ट किए जाने पर तंज कसते हुए राउत ने पूछा कि आखिर इस तथाकथित ‘मजबूत’ सरकार को डर किससे है?

बीएमसी के नतीजों ने सत्ता के समीकरणों को इतना उलझा दिया है कि अब हर एक पार्षद की कीमत सोने के बराबर हो गई है। भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े 114 से वह अभी भी काफी दूर है। ऐसे में निर्दलीयों और छोटे दलों के साथ-साथ गठबंधन सहयोगियों के बीच खींचतान चरम पर है। इसी खींचतान का नतीजा है कि मुंबई में एक बार फिर ‘होटल पॉलिटिक्स’ की वापसी हुई है, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति के पुराने जख्मों को हरा कर दिया है।

आखिर डर किसे है? होटल में पार्षदों की ‘बंदी’ पर राउत का सवाल

संजय राउत ने रविवार को मीडिया से बातचीत के दौरान शिंदे गुट की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक तरफ मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस राज्य में स्थिरता का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव जीतते ही अपने ही पार्षदों को पांच सितारा होटलों में कैद कर दिया जाता है। राउत ने तंज भरे लहजे में कहा, “आखिर डर किसे है? क्या मुख्यमंत्री को अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा नहीं है? इन पार्षदों को ताज होटल में भारी पुलिस सुरक्षा के बीच रखना उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।”

शिंदे गुट ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा है कि यह केवल एक ‘ओरिएंटेशन वर्कशॉप’ है, जिसमें नए पार्षदों को बीएमसी के कामकाज की तकनीकी जानकारी दी जा रही है। हालांकि, राउत ने इस स्पष्टीकरण को हास्यास्पद करार दिया। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री फडणवीस दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में राज्य के लिए निवेश मांग रहे हैं, तब मुंबई में उनकी सहयोगी पार्टी अपने पार्षदों के अपहरण के डर से उन्हें होटलों में छिपा रही है। यह स्थिति राज्य की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक नैतिकता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है।

शिवसेना का 25 साल का किला और प्रधानमंत्री के बयान पर पलटवार

मुंबई में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान ने भी आग में घी डालने का काम किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा ने मुंबई से कांग्रेस को उखाड़ फेंका है। इस पर पलटवार करते हुए संजय राउत ने इतिहास की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि बीएमसी पर पिछले 25 वर्षों से शिवसेना का निर्बाध शासन रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि मुंबई में संघर्ष हमेशा शिवसेना और अन्य दलों के बीच रहा है, जबकि भाजपा लंबे समय तक यहां एक जूनियर पार्टनर की भूमिका में ही रही है।

राउत ने कहा कि कांग्रेस की स्थापना मुंबई में हुई थी और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत भी इसी धरती से हुई थी। उस दौर में भाजपा का कहीं अस्तित्व भी नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आज इतिहास को मिटाने की कोशिश कर रही है, लेकिन मुंबई की जनता जानती है कि इस शहर की नब्ज पर किसका हाथ है। राउत के मुताबिक, भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी बनना केवल आंकड़ों का खेल है, लेकिन मुंबई की आत्मा और उसकी नगर पालिका पर अधिकार आज भी उस सोच का है जिसे बालासाहेब ठाकरे ने सींचा था।

‘देव’ की इच्छा और ठाकरे भाइयों के बीच संभावित गठबंधन की सुगबुगाहट

बीएमसी की सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर है। संजय राउत ने इस बात की पुष्टि की है कि मेयर पद को लेकर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच प्राथमिक स्तर पर बातचीत हुई है। चुनाव परिणामों के बाद शिवसेना (यूबीटी) और मनसे का गठबंधन एक महत्वपूर्ण ब्लॉक के रूप में उभरा है, जिसके पास कुल 71 सीटें हैं। यद्यपि यह आंकड़ा भी बहुमत से दूर है, लेकिन यह भाजपा के खेल को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त है।

उद्धव ठाकरे के उस बयान का जिक्र करते हुए जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘अगर देव की इच्छा हुई तो हमारा ही मेयर बनेगा’, राउत ने संकेत दिया कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। उन्होंने दावा किया कि शिंदे गुट के कई पार्षद आज भी मातोश्री के संपर्क में हैं। राउत ने एक बड़ा राजनीतिक दावा करते हुए कहा कि खुद एकनाथ शिंदे भी मन ही मन नहीं चाहते कि मुंबई में भाजपा का मेयर बने, क्योंकि ऐसा होने पर शिवसेना का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि शिंदे गुट के पार्षदों को होटल में रखने का असली कारण यही है कि वे कहीं वापस उद्धव ठाकरे के पास न चले जाएं।

बीएमसी के जटिल आंकड़े और भाजपा की चुनौतियां

चुनाव आयोग के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, जिसे करीब 21.58 प्रतिशत वोट मिले हैं। उसकी सहयोगी शिंदे सेना ने 29 सीटें जीती हैं, जिससे इस ब्लॉक की कुल संख्या 118 तक पहुंच जाती है, जो बहुमत के आंकड़े 114 से अधिक है। कागजों पर यह गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में दिख रहा है, लेकिन पेंच मेयर पद की दावेदारी को लेकर फंसा है। शिंदे गुट अपनी 29 सीटों की बदौलत किंगमेकर की भूमिका में है और वह बीएमसी में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है।

दूसरी ओर, विपक्ष भी बिखरा हुआ है। कांग्रेस को 24, एआईएमआईएम को 8, और शरद पवार की एनसीपी को 1 सीट मिली है। समाजवादी पार्टी के पास 2 सीटें हैं। यदि उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, कांग्रेस और अन्य छोटे दल एक साथ आते हैं, तब भी वे बहुमत के करीब नहीं पहुंच पाते। हालांकि, राउत का कहना है कि वे फिलहाल इस पूरे राजनीतिक ड्रामे का आनंद ले रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि यूबीटी गुट विपक्ष में बैठेगा या कोई नया समीकरण बनाएगा, इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

शिंदे की रणनीति और पार्षदों की ‘किलेबंदी’

संजय राउत ने एकनाथ शिंदे पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन्होंने पहले अपनी पार्टी तोड़ी, वे अब दूसरों को तोड़ने का डर दिखा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शिंदे ने न केवल मुंबई बल्कि अन्य नगर निकायों में भी पार्षदों की खरीद-फरोख्त की योजना बनाई है। राउत के अनुसार, होटलों में पुलिस का कड़ा पहरा यह सुनिश्चित करने के लिए है कि कोई भी पार्षद बाहरी दुनिया या उद्धव ठाकरे के दूतों से संपर्क न कर सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीएमसी का यह संघर्ष केवल एक नगर पालिका का चुनाव नहीं है, बल्कि यह आगामी विधानसभा चुनावों का ट्रेलर है। यदि भाजपा मुंबई में अपना मेयर बनाने में सफल रहती है, तो यह उद्धव ठाकरे के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका होगा। वहीं, यदि उद्धव और राज मिलकर कोई चमत्कार करते हैं, तो यह शिंदे-भाजपा सरकार की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। फिलहाल, मुंबई की जनता अपने नए मेयर का इंतजार कर रही है, जबकि नेता होटलों और बंद कमरों में आंकड़ों की बाजीगरी में मशगूल हैं।

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