• January 19, 2026

मध्य पूर्व में शांति के लिए पुतिन का ‘मिशन मध्यस्थता’: इजरायल और ईरान के शीर्ष नेतृत्व से की सीधी बात, कूटनीतिक हल पर जोर

मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) इस समय बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है, जहां ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस गंभीर संकट के बीच अब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने मोर्चा संभाल लिया है। वैश्विक राजनीति के केंद्र में रहने वाले पुतिन ने क्षेत्र में संभावित युद्ध को टालने और स्थिरता बहाल करने के लिए अपनी कूटनीतिक सक्रियता को तेज कर दिया है। मास्को से शुरू हुई इस कूटनीतिक पहल के तहत राष्ट्रपति पुतिन ने पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन किया और उसके तुरंत बाद ईरान के राष्ट्रपति से संवाद साधा। रूस की इस पहल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े ‘पीस मिशन’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य दो कट्टर दुश्मनों को बातचीत की मेज पर लाकर एक बड़े सैन्य टकराव को रोकना है।

क्रेमलिन द्वारा जारी आधिकारिक बयानों के अनुसार, रूस का रुख पूरी तरह स्पष्ट है—वह इस संकट का समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति की मेज पर चाहता है। पुतिन की यह कवायद केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस ने इस जटिल विवाद में एक आधिकारिक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की भी पेशकश की है। रूस के इस कदम ने न केवल मध्य पूर्व बल्कि पश्चिमी देशों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है, क्योंकि रूस के संबंध ईरान और इजरायल दोनों के साथ एक विशेष स्तर पर संतुलित रहे हैं।

इजरायल के प्रधानमंत्री के साथ पुतिन की अहम बातचीत

राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी इस कूटनीतिक श्रृंखला की शुरुआत इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ फोन पर चर्चा करके की। इस बातचीत का मुख्य एजेंडा मध्य पूर्व में बढ़ती सैन्य हलचल और ईरान के साथ इजरायल के बिगड़ते रिश्तों पर केंद्रित था। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि पुतिन ने नेतन्याहू के साथ बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि रूस क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कूटनीतिक प्रयास करने को तैयार है। पुतिन ने इजरायली नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी तरह का सैन्य टकराव न केवल इस क्षेत्र के लिए बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी विनाशकारी साबित हो सकता है।

पुतिन ने इस बातचीत के दौरान कूटनीतिक रास्ता अपनाने की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और स्थिरता की बहाली के लिए राजनीतिक संवाद ही एकमात्र और बेहतर विकल्प है। रूस का मानना है कि सैन्य शक्ति का प्रदर्शन केवल तात्कालिक समाधान दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक शांति केवल आपसी समझौतों और अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में रहकर ही प्राप्त की जा सकती है। इजरायल के लिए रूस की यह मध्यस्थता की पेशकश काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूस की सीरिया में मौजूदगी और ईरान के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी उसे एक ऐसा खिलाड़ी बनाती है जिसकी बात को नजरअंदाज करना इजरायल के लिए आसान नहीं है।

ईरान के राष्ट्रपति से संपर्क और कूटनीतिक संतुलन

इजरायल के प्रधानमंत्री से बात करने के तुरंत बाद पुतिन का ईरान के राष्ट्रपति से संपर्क साधना रूस की उस संतुलित विदेश नीति का हिस्सा है, जिसके लिए वह जाना जाता है। ईरान के साथ रूस के रिश्ते हाल के वर्षों में रक्षा और व्यापारिक स्तर पर काफी मजबूत हुए हैं। ऐसे में पुतिन की यह बातचीत केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक ठोस प्रयास थी ताकि तेहरान के रुख को समझा जा सके और उन्हें किसी भी उकसावे वाली कार्रवाई से बचने के लिए प्रेरित किया जा सके। रूस का मानना है कि जब तक दोनों पक्षों से सीधे और उच्च स्तरीय संवाद नहीं होगा, तब तक गलतफहमियां कम नहीं की जा सकतीं।

ईरानी राष्ट्रपति के साथ पुतिन की चर्चा इस मायने में भी अहम है कि ईरान इस समय क्षेत्रीय राजनीति में एक धुरी की तरह काम कर रहा है। पुतिन ने ईरान को यह समझाने का प्रयास किया है कि रूस मध्य पूर्व की स्थिति को शांत करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाता रहेगा। इस संवाद का मुख्य उद्देश्य टकराव की आशंका को घटाना और एक ऐसी स्थिति पैदा करना है जहां दोनों पक्ष कम से कम बातचीत शुरू करने के लिए सहमत हों। पुतिन की यह पहल दर्शाती है कि रूस स्वयं को मध्य पूर्व के एक ऐसे रक्षक के रूप में देख रहा है जो न केवल अपनी रणनीतिक बढ़त चाहता है, बल्कि क्षेत्र को युद्ध की आग में झुलसने से बचाने के लिए भी प्रतिबद्ध है।

रूस की मध्यस्थता और क्षेत्रीय स्थिरता के मायने

रूस द्वारा मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश के पीछे कई गहरे राजनीतिक और रणनीतिक कारण हैं। सबसे पहले, रूस मध्य पूर्व में अपनी खोई हुई साख को पुनर्जीवित करना चाहता है और यह दिखाना चाहता है कि वह अमेरिका के समानांतर एक प्रभावी शांति दूत बन सकता है। जब पुतिन कहते हैं कि राजनीतिक रास्ता ही बेहतर विकल्प है, तो उनका इशारा उन वैश्विक शक्तियों की ओर भी होता है जो सैन्य समाधान को प्राथमिकता देती हैं। रूस का यह रुख कि क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता प्राथमिकता होनी चाहिए, खाड़ी देशों और अन्य पड़ोसी देशों के बीच उसकी छवि को सकारात्मक बनाता है।

इस कूटनीतिक सक्रियता का एक बड़ा संदेश यह भी है कि सैन्य तनाव से बचना ही वर्तमान विश्व की आवश्यकता है। पुतिन ने दोनों पक्षों को यह समझाने की कोशिश की है कि एक छोटा सा सैन्य कदम भी पूरे क्षेत्र को अनियंत्रित हिंसा की चपेट में ले सकता है। रूस की मध्यस्थता का आधार यह है कि उसके पास दोनों देशों (ईरान और इजरायल) के शीर्ष नेतृत्व तक सीधी पहुंच है। जहां एक ओर रूस और ईरान के बीच गहरा सैन्य सहयोग है, वहीं दूसरी ओर रूस और इजरायल के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध भी मजबूत रहे हैं। इसी अद्वितीय स्थिति का लाभ उठाकर पुतिन मध्य पूर्व के इस सबसे कठिन संकट को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

भविष्य की राह और कूटनीतिक चुनौतियां

हालांकि रूस की पहल सराहनीय है, लेकिन मध्य पूर्व में शांति का मार्ग कांटों भरा है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुतिन क्षेत्रीय हालात को शांत करने की दिशा में अपने प्रयास जारी रखेंगे, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान और इजरायल रूस की इस मध्यस्थता को कितनी गंभीरता से लेते हैं। फिलहाल, पुतिन की सक्रियता ने तनाव के बढ़ते ग्राफ को कुछ हद तक थामने का काम किया है। रूस का कहना है कि वह मध्य पूर्व और ईरान से जुड़े हालात में तनाव कम करने के लिए आने वाले दिनों में और भी कई देशों के नेताओं से संपर्क कर सकता है।

पुतिन की इस कवायद ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि जब बड़ी शक्तियां कूटनीति को प्राथमिकता देती हैं, तो युद्ध की संभावनाओं को कम किया जा सकता है। रूस का यह मिशन न केवल ईरान और इजरायल के बीच की खाई को पाटने का प्रयास है, बल्कि यह क्षेत्र में एक नए सुरक्षा ढांचे की नींव रखने की कोशिश भी हो सकती है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पुतिन का यह ‘फोन डिप्लोमेसी’ मिशन जमीनी स्तर पर शांति ला पाएगा या मध्य पूर्व में तनाव की चिंगारी अभी और सुलगती रहेगी।

Digiqole Ad

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *