• January 19, 2026

बीएमसी चुनाव परिणाम: संजय राउत का एकनाथ शिंदे पर तीखा प्रहार; ‘मराठी मानुष’ से गद्दारी और बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व पर उठाए सवाल

मुंबई: बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। तीन दशकों से मुंबई की सत्ता पर काबिज ठाकरे परिवार के दबदबे को इस बार भाजपा और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गठबंधन ने कड़ी चुनौती दी है। इन नतीजों के बाद शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद और फायरब्रांड नेता संजय राउत ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर ‘विश्वासघात’ का बड़ा आरोप लगाया है। शनिवार को मीडिया से बात करते हुए राउत ने कहा कि शिंदे की ‘गद्दारी’ की वजह से ही आज भारतीय जनता पार्टी को मुंबई में अपना मेयर बनाने का मौका मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि यदि मराठी वोट बैंक में यह फूट न डाली गई होती, तो भाजपा अगले कई वर्षों तक मुंबई की सत्ता का सपना भी नहीं देख सकती थी।

चुनावी आंकड़ों का गणित और सत्ता का समीकरण

बीएमसी की 227 सीटों के लिए हुए इस महामुकाबले के नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के गठबंधन ने कुल 89 सीटों पर जीत हासिल की है। हालांकि, यह आंकड़ा बहुमत से दूर है, लेकिन इसने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के 30 साल पुराने एकाधिकार को तोड़ दिया है। भाजपा को मुंबई की सत्ता की चाबी संभालने के लिए अब अपने सहयोगी शिंदे गुट के 29 पार्षदों के पूर्ण समर्थन की आवश्यकता होगी।

दूसरी ओर, विपक्षी खेमे में शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जबकि उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) को केवल छह सीटें ही मिल सकीं। इन आंकड़ों से साफ है कि मुंबई अब एक त्रिशंकु स्थिति में है, जहां गठबंधन की राजनीति ही सत्ता का भविष्य तय करेगी।

‘ठाकरे भाइयों’ का गठबंधन और मराठी गढ़ों की रक्षा

संजय राउत ने चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए एक सकारात्मक पक्ष भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि भले ही उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की पार्टियों का गठबंधन सत्ता के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाया, लेकिन दोनों भाइयों की पार्टियों ने मिलकर कुल 71 सीटें जीती हैं। राउत के अनुसार, यह इस बात का प्रमाण है कि मुंबई का ‘मराठी मानुष’ आज भी ठाकरे ब्रांड के साथ खड़ा है। उन्होंने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया कि तमाम विपरीत परिस्थितियों और सत्ता के दबाव के बावजूद मध्य मुंबई के पारंपरिक मराठी गढ़ों में शिवसेना (यूबीटी) का भगवा मजबूती से लहरा रहा है।

हालांकि, राउत ने एमएनएस के प्रदर्शन पर थोड़ी निराशा भी व्यक्त की। उन्होंने स्वीकार किया कि राज ठाकरे की पार्टी से कम से कम 10 से 12 अतिरिक्त सीटें जीतने की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हो सकी। उन्होंने यह भी दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस का गठबंधन कई महत्वपूर्ण सीटों पर बहुत ही मामूली अंतर (50 से 100 वोट) से हार गया, अन्यथा आज परिणाम कुछ और ही होते।

एकनाथ शिंदे पर विश्वासघात का आरोप: “मराठी जनता माफ नहीं करेगी”

संजय राउत ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को सीधे निशाने पर लेते हुए उन्हें मराठी हितों का ‘शत्रु’ करार दिया। उन्होंने कहा, “एकनाथ शिंदे ने केवल शिवसेना से गद्दारी नहीं की, बल्कि उन्होंने मुंबई और यहां के मराठी भाषी लोगों की पीठ में छुरा घोंपा है।” राउत ने कड़े शब्दों में कहा कि शिंदे की इसी गद्दारी की बदौलत आज भाजपा मुंबई का मेयर बनाने की स्थिति में आई है, वरना भाजपा की 100 पीढ़ियां भी मुंबई की सत्ता पर काबिज नहीं हो पातीं।

राउत ने दावा किया कि शिंदे गुट के साथ गए अधिकांश पार्षदों को जनता ने नकार दिया है। उन्होंने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश करते हुए कहा कि जो 60 पार्षद उद्धव ठाकरे को छोड़कर शिंदे गुट में शामिल हुए थे, उनमें से 90 प्रतिशत चुनाव हार गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि जनता को गद्दारी पसंद नहीं आई और उन्होंने वास्तविक शिवसेना के प्रति अपना समर्थन जताया है।

भाजपा की रणनीति और शिंदे-अजित पवार का राजनीतिक भविष्य

संजय राउत ने भविष्य की राजनीति पर भविष्यवाणी करते हुए कहा कि मुंबई और अन्य 24 नगर निगमों में भाजपा की इस बड़ी जीत के बाद एकनाथ शिंदे की प्रासंगिकता खत्म हो जाएगी। उन्होंने तर्क दिया कि भाजपा ने शिंदे का इस्तेमाल केवल शिवसेना को तोड़ने और मुंबई की सत्ता हथियाने के लिए किया था। अब जब भाजपा खुद को मजबूत कर चुकी है, तो वह धीरे-धीरे शिंदे की राजनीतिक हैसियत को खत्म कर देगी।

राउत ने उपमुख्यमंत्री अजित पवार को लेकर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि अजित पवार भी इस गठबंधन सरकार में बहुत लंबे समय तक नहीं टिक पाएंगे। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दोनों गुटों के एक साथ आने या घर वापसी की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। राउत के मुताबिक, भाजपा का अंतिम लक्ष्य अपने सहयोगियों को छोटा करना और खुद को एकमात्र शक्ति के रूप में स्थापित करना है।

कांग्रेस की सराहना और विपक्षी एकता का नया रूप

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संजय राउत ने कांग्रेस की रणनीति की भी खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि बीएमसी चुनाव में अकेले उतरने और वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) के साथ तालमेल बिठाने का कांग्रेस का फैसला सफल रहा। कांग्रेस और प्रकाश अंबेडकर की पार्टी के गठबंधन ने 24 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई है। राउत ने इसे विपक्षी वोटों के बिखराव को रोकने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना और कहा कि आने वाले विधानसभा चुनावों में यह समीकरण भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है।

मुंबई के हितों के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प

अंत में, संजय राउत ने मुंबई की जनता को आश्वासन दिया कि भले ही उनके पास मेयर का पद न हो, लेकिन शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस का गठबंधन सदन में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे भाजपा-शिंदे सरकार को मुंबई के हितों, यहां की जमीन और संसाधनों के खिलाफ कोई भी फैसला नहीं लेने देंगे। राउत ने जोर देकर कहा कि मुंबई का स्वाभिमान और ‘मराठी अस्मिता’ उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहेगी और वे सड़क से लेकर सदन तक इसकी रक्षा करेंगे।

इस चुनाव परिणाम ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां आगामी विधानसभा चुनाव की लड़ाई और भी अधिक दिलचस्प और व्यक्तिगत होने वाली है। क्या भाजपा अपना मेयर बना पाएगी या ठाकरे भाई मिलकर कोई नया खेल करेंगे, यह आने वाले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।

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