• January 19, 2026

टैक्स संप्रभुता सर्वोपरि: अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- ‘दबाव में न ले फैसले’

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय कर संधियों और द्विपक्षीय समझौतों के संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी टिप्पणी की है। एक मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार द्वारा की जाने वाली कोई भी संधि या समझौता केवल और केवल देशहित को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने आगाह किया कि विदेशी सरकारों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के किसी भी प्रकार के दबाव में आकर राष्ट्रीय हितों से समझौता करना देश की संप्रभुता के लिए ठीक नहीं है।

विदेशी दबाव से मुक्त हो देश की कर नीतियां

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि भारत को अपनी ‘टैक्स संप्रभुता’ (Tax Sovereignty) की रक्षा हर हाल में करनी चाहिए। अदालत ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि वैश्विक स्तर पर संधियां करते समय कई बार बाहरी कारकों का प्रभाव रहता है, लेकिन एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत को अपनी निष्पक्षता और अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए। पीठ ने रेखांकित किया कि अंतरराष्ट्रीय टैक्स समझौतों में शामिल होते समय सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन समझौतों का आधार समानता और न्याय हो, न कि किसी शक्तिशाली वैश्विक संस्था का प्रभाव।

संधियों के दुरुपयोग को रोकने की आवश्यकता

अदालत ने अंतरराष्ट्रीय कर समझौतों के संभावित दुरुपयोग को लेकर भी चिंता व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब भारत किसी विदेशी राष्ट्र के साथ टैक्स संधि (जैसे DTAA – दोहरा कराधान परिहार समझौता) में दाखिल होता है, तो उसका मुख्य उद्देश्य व्यापार सुगमता और न्यायसंगत टैक्स व्यवस्था होनी चाहिए। हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इन समझौतों की शर्तों का इस तरह से लाभ नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे भारत के राजस्व को नुकसान पहुंचे या टैक्स चोरी के रास्ते खुलें।

अदालत के अनुसार, यह सुनिश्चित करना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है कि इन समझौतों की आड़ में कर चोरी न हो और इनका दुरुपयोग न होने पाए। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां टैक्स बचाने के लिए विभिन्न देशों के बीच की संधियों की विसंगतियों का लाभ उठाने का प्रयास करती हैं।

राष्ट्रहित ही अंतिम मानदंड

सुप्रीम कोर्ट ने अपने संबोधन के अंत में पुनः दोहराया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि की सफलता और उसकी वैधता इस बात पर टिकी होती है कि वह देश के आर्थिक ढांचे को कितना मजबूत बनाती है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि भविष्य में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कर संबंधी बातचीत करते समय भारत को अपनी संप्रभुता और घरेलू नीतियों की मजबूती को ध्यान में रखना चाहिए। इस टिप्पणी को कानूनी और कूटनीतिक हलकों में भारत की आर्थिक स्वायत्तता को सुरक्षित करने के एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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