गुजरात के स्कूलों में कट्टरपंथ फैलाने की बड़ी साजिश नाकाम: NIA ने 5 आरोपियों पर दाखिल की चार्जशीट, शरिया कानून और सशस्त्र विद्रोह का था इरादा
अहमदाबाद/नई दिल्ली: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने गुजरात में सक्रिय अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) के एक बड़े मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए सनसनीखेज खुलासे किए हैं। शनिवार को एनआईए ने पांच आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि कट्टरपंथी ताकतें गुजरात के स्कूलों और भोले-भाले युवाओं को निशाना बनाकर भारत की लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की साजिश रच रही थीं। इन आरोपियों का मुख्य उद्देश्य भारत में शरिया कानून पर आधारित ‘खिलाफत’ की स्थापना करना था। एनआईए की इस कार्रवाई ने देश विरोधी ताकतों के उस ऑनलाइन नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया है जो डिजिटल माध्यमों से युवाओं के दिमाग में जहर घोल रहा था।
सोशल मीडिया बना कट्टरपंथ का हथियार: NIA का खुलासा
एनआईए द्वारा दर्ज मामले (RC-02/2025/NIA/AMD) की जांच में यह बात सामने आई है कि प्रतिबंधित आतंकी संगठन एक्यूआईएस (AQIS) के इन पांचों गुर्गों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया था। आरोपियों की पहचान मोहम्मद फरदीन, कुरैशी सेफुल्ला, मोहम्मद फैक, जीशान अली और शमा परवीन के रूप में हुई है। इन सभी पर यूएपीए (UAPA), बीएनएस (BNS) अधिनियम और शस्त्र अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
जांच से पता चला है कि इन आरोपियों ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कई फर्जी और सक्रिय खाते बना रखे थे। इनके माध्यम से वे भड़काऊ वीडियो, ऑडियो संदेश और तस्वीरें साझा करते थे। इन पोस्टों का एकमात्र मकसद युवाओं को भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ भड़काना और उन्हें हथियार उठाने के लिए प्रेरित करना था। एनआईए ने तकनीकी जांच के दौरान इन आरोपियों के ‘डिजिटल फुटप्रिंट्स’ का पता लगाया है, जो इनके खिलाफ सबसे मजबूत सबूत बनकर उभरे हैं।
गजवा-ए-हिंद और सशस्त्र विद्रोह का आह्वान
चार्जशीट के अनुसार, आरोपियों की साजिश केवल वैचारिक नहीं थी, बल्कि वे सक्रिय रूप से तख्तापलट और हिंसा की योजना बना रहे थे। उन्होंने अपने फॉलोअर्स से लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई भारत सरकार के खिलाफ ‘सशस्त्र विद्रोह’ करने और शरिया कानून लागू करने का आह्वान किया था। वे ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसी चरमपंथी विचारधाराओं का प्रचार कर रहे थे, जिसका उद्देश्य भारत की क्षेत्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचाना है।
जांच में यह भी पाया गया कि इन आरोपियों ने न केवल अल-कायदा, बल्कि जैश-ए-मोहम्मद जैसे अन्य प्रतिबंधित संगठनों की साहित्य सामग्री को भी प्रसारित किया। गुजरात एटीएस ने शुरुआती जांच में इन आरोपियों के पास से कारतूस, सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल और तलवार जैसे घातक हथियार बरामद किए थे, जिससे यह साबित होता है कि यह समूह केवल ऑनलाइन दुष्प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि जमीनी स्तर पर हिंसक वारदातों को अंजाम देने की तैयारी में था।
साजिश के सूत्रधार: दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक फैला नेटवर्क
एनआईए की चार्जशीट में प्रत्येक आरोपी की भूमिका को विस्तार से बताया गया है। पुरानी दिल्ली का रहने वाला मोहम्मद फैक इस पूरी साजिश का मुख्य रणनीतिकार बनकर उभरा है। फैक ने इंस्टाग्राम पर विशेष समूह बनाए थे, जहां वह अल-कायदा और जैश-ए-मोहम्मद के नेताओं के भाषण और जहरीले साहित्य के अंश साझा करता था। उसने समाज के एक विशेष वर्ग के खिलाफ हिंसा भड़काने में अहम भूमिका निभाई।
अहमदाबाद का मोहम्मद फरदीन और मोदासा का कुरैशी सेफुल्ला गुजरात में इस नेटवर्क के स्थानीय हैंडलर थे। वे नियमित रूप से जिहाद और सरकार के खिलाफ विद्रोह को उकसाने वाली पोस्ट पर कमेंट और लाइक करते थे ताकि उन्हें एल्गोरिदम के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके। नोएडा का जीशान अली भी इस डिजिटल अभियान में सक्रिय रूप से शामिल पाया गया।
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला नाम शमा परवीन का है, जो बेंगलुरु की रहने वाली है। शमा न केवल अल-कायदा के वीडियो प्रमोट कर रही थी, बल्कि वह पाकिस्तान में बैठे अपने हैंडलर सुमेर अली के नियमित संपर्क में भी थी। वह उसे भारत में चलाए जा रहे प्रतिबंधित अभियानों के स्क्रीनशॉट भेजती थी और उन पर चर्चा करती थी। शमा के फोन से पाकिस्तानी संपर्क नंबर और भारी मात्रा में आपत्तिजनक डिजिटल साहित्य बरामद किया गया है।
स्कूलों और युवाओं पर विशेष ध्यान: एक गहरी साजिश
जांच में यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि इस मॉड्यूल का विशेष ध्यान गुजरात के स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास रहने वाले कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के युवाओं पर था। आरोपियों ने ऐसी रणनीति बनाई थी जिससे ‘ऑनलाइन कट्टरपंथीकरण’ (Online Radicalization) के जरिए उन युवाओं को प्रभावित किया जा सके जो अपनी पहचान या भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।
एनआईए के अधिकारियों का मानना है कि इन आरोपियों ने स्कूलों के छात्रों तक पहुंच बनाने के लिए शैक्षणिक सामग्री के बीच में धार्मिक और कट्टरपंथी संदेशों को मिलाने की कोशिश की थी। हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी के कारण इस साजिश को बड़े स्तर पर फैलने से पहले ही पकड़ लिया गया।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती
एनआईए ने इस मामले की जांच गुजरात एटीएस से अपने हाथ में ली थी क्योंकि इसके तार अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों और विदेशी हैंडलर्स से जुड़े थे। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और पहलगाम हमले के बाद इस समूह की सक्रियता और अधिक बढ़ गई थी, जिसे एनआईए ने ट्रैक किया। एजेंसी का कहना है कि यह मामला दिखाता है कि कैसे विदेशी धरती से संचालित होने वाले आतंकी संगठन भारत के भीतर ‘स्लीपर सेल्स’ और ‘लोन वुल्फ’ हमलावर तैयार करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं।
फिलहाल, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193(9) के तहत मामले की जांच जारी है। एनआईए अन्य संभावित आरोपियों और वित्तीय स्रोतों की भी तलाश कर रही है जो इस नेटवर्क को फंड मुहैया करा रहे थे।