• March 8, 2026

विपक्ष जनभावना को समझने में विफल

 विपक्ष जनभावना को समझने में विफल

राज्यसभा चुनाव में जमकर हुई क्रॉस वोटिंग के दम पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में दो अतिरिक्त सीट पर विजय हासिल कर ली। नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी करके क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों पर हमेशा की तरह ‘बिक जाने’ या ‘डर जाने’ के आरोप लगाए जा रहे हैं लेकिन इस बार की क्रॉस वोटिंग सिर्फ इतने तक सीमित दिखाई नहीं देती। भाजपा और मोदी विरोधी विपक्षी दलों के शीर्ष नेतृत्व ने पिछले कुछ समय में जिस तरह से जनभावना के विपरीत फैसले लिए हैं उनसे इन दलों में तेजी से असंतोष बढ़ा है। खासतौर से अयोध्या में श्रीराम लला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह का विपक्षी दलों ने जिस तरह बहिष्कार किया, वह पार्टी के समर्थकों और तमाम नेताओं को रास नहीं आया। तमाम विपक्षी नेता प्रभु राम, सनातन धर्म और संस्कृति के खिलाफ अनर्गल बयान दे रहे थे लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चुप्पी साधे हुए था जिससे कई नेताओं ने बगावती तेवर दिखाए तो कुछ असंतोष की आग को मन में दबा कर बैठे रहे। और अब राज्यसभा चुनाव के मौके पर वे खुलकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खड़े हो गए।

राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग कोई अनोखी बात नहीं है। आज तक राज्यसभा का शायद ही कोई चुनाव हुआ हो जिसमें विधायकों ने अपनी पार्टी के नेतृत्व की अनदेखी करके किसी अन्य दल के उम्मीदवार की मदद न की हो। यह मदद परिस्थितियों के आधार पर तीन प्रकार से की जाती है एक तो विधायक अपना मत सीधे तौर पर विरोधी दल के उम्मीदवार को दे देते हैं, दूसरे वे मतदान में भाग ही नहीं लेते और तीसरे तरीके में वोट तो डालते हैं लेकिन इस तरह कि उनका वोट खारिज हो जाए। तीसरा ज्यादा सुरक्षित तरीका है क्योंकि इसे विधायक की गलती मानकर अनदेखा किया जा सकता है। हाल ही में हुए राज्यसभा के चुनाव में भी माना जा रहा था कि विधायक पार्टी नेतृत्व के फैसले के खिलाफ जाकर क्रॉस वोटिंग करेंगे लेकिन इस इस स्थिति से निपटने के लिए विपक्षी दलों विशेषकर समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश और कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में कोई खास रणनीति तैयार नहीं की।

उत्तर प्रदेश से दस राज्यसभा सदस्यों को चुनकर राज्यसभा जाना था। इसके लिए भाजपा के पास सात तो समाजवादी पार्टी के पास तीन उम्मीदवारों को जिताने के लिए लिए पर्याप्त संख्या बल था। लेकिन भाजपा ने आठवें उम्मीदवार के तौर पर संजय सेठ को चुनाव मैदान में उतार कर यहां का मुकाबला रोचक बना दिया। दरअसल संजय सेठ पुराने समाजवादी नेता रहे हैं। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और बाद में सपा मुखिया अखिलेश यादव से उनके नजदीकी रिश्ते जगजाहिर थे। समाजवादी पार्टी की नीति निर्धारण में भी संजय सेठ का प्रभावशाली दखल रहता था। संजय सेठ ने 2019 में सपा को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच उनकी अच्छी पैठ है। ऐसे में जब भाजपा ने आठवें उम्मीदवार के तौर पर उन्हें चुनाव मैदान में उतारा अखिलेश यादव को तभी ज्यादा सतर्क होकर अपनी रणनीति तैयार करनी चाहिए थी। मतदान से एक दिन पहले सपा मुखिया के रात्रिभोज से नदारद रहकर आठ विधायकों ने अपनी मंशा साफ कर दी थी। इनमें से छह विधायकों ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट डाला जबकि अमेठी की विधायक महाराजी प्रजापति ने मतदान से दूर रहकर भाजपा उम्मीदवार की मदद की। गलत तरीके से वोट डालने के कारण बरेली के भोजीपुरा से सपा विधायक शहजिल इस्लाम अंसारी का वोट अमान्य कर दिया गया।

सबसे ज्यादा हैरान करने वाला चुनाव हिमाचल प्रदेश में देखने को मिला। यहां से एक राज्यसभा सदस्य का चुनाव किया जाना था। यहां 68 में से 40 विधायक कांग्रेस के, 25 भाजपा और तीन निर्दलीय हैं। सामान्य तौर पर राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय विधायक राज्य में सत्ताधारी दल के साथ खड़े होते रहे हैं इसके अलावा विपक्षी दलों के विधायक भी उसी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करते हैं। इसलिए ऐसा माना जा रहा था कि यहां का मुकाबला कांग्रेस आसानी से जीत जाएगी। लेकिन भाजपा ने यहां से पूर्व कांग्रेसी हर्ष महाजन को उम्मीदवार बनाकर और कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी की राह मुश्किल कर दी। यूं तो सिंघवी की उम्मीदवारी का ऐलान होते ही उनको बाहरी बताते हुए हिमाचल प्रदेश से विरोध के स्वर उठना शुरू हो गए थे लेकिन उनकी असल मुश्किलें हर्ष महाजन के चुनाव मैदान में उतरने से खड़ी हुईं।

दरअसल हर्ष महाजन का कांग्रेस से चार दशक से भी पुराना रिश्ता था। वे पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के मुख्य रणनीतिकार माने जाते थे। वह विधायक, मंत्री और यूथ कांग्रेस अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे। उन्होंने 2022 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता हासिल कर ली थी। भाजपा की ओर से उनकी उम्मीदवारी की घोषणा होते ही उनके पक्ष में क्रॉस वोटिंग की उम्मीद जताई जा रही थी। लेकिन विधायकों की संख्या में भारी अंतर होने की वजह से उनकी जीत की संभावना कम दिखाई दे रही थी। कांग्रेस नेतृत्व की नाकामी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू अपने विधायकों के अपहरण का हरियाणा पर आरोप मढ़ रहे थे। किसी राज्य की पुलिस और खुफिया तंत्र के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। अगर इस घटना का किसी आतंकवादी समूह ने अंजाम दिया होता तो क्या यह घटना इतनी ही सामान्य तौर पर ली जाती।

राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग सिर्फ भाजपा के पक्ष में ही नहीं हुई, भाजपा के खिलाफ भी उसके समर्थक विधायकों ने विरोधी दल के उम्मीदवार को अपना मत दिया। उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा के एक विधायक ने सपा उम्मीदवार को वोट दिया। इसी तरह कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस भाजपा विधायक से अपने पक्ष में क्रॉस वोटिंग कराने में कामयाब रही। भाजपा के पक्ष में वोटिंग करने वाले विधायकों पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वे ‘बिक गए’ या फिर केंद्रीय जांच संस्थाओं के ‘डर’ की वजह से उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया है।

बीते कुछ समय से भाजपा विरोधी दलों के नेताओं ने सनातन धर्म और संस्कृति के खिलाफ जिस तरह विष वमन किया है, उसका क्रॉस वोटिंग करने वाले अधिकांश नेताओं ने प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर उसका विरोध किया था। सपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य प्रभु राम, रामचरित मानस और हिन्दू धर्म के खिलाफ अनर्गल बयान दे रहे थे। तो उदयनिधि स्टालिन जैसे तमाम नेता सनातन धर्म और संस्कृति के खिलाफ जहर उगल रहे थे। रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण ठुकराकर इन दलों के शीर्ष नेतृत्व ने जनभावना की उपेक्षा की सारी सीमाएं पार कर दीं।

सपा मुख्य सचेतक पद से इस्तीफा देने वाले ऊंचाहार से विधायक मनोज पांडे ने तो स्वामी प्रसाद मौर्य को मानसिक विक्षिप्त तक कह दिया था। अखिलेश यादव के फैसले के खिलाफ सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह ने विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना को पत्र लिखकर विधायकों को रामलला के दर्शन कराने का आग्रह किया था। इसी तरह वीरभद्र सिंह के पुत्र और सुक्खू सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले विक्रमादित्य सिंह पार्टी नेतृत्व के निर्णय के विपरीत जाकर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए थे। इसलिए क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों के फैसले को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सनातन भारतीय संस्कृति विरोधी फैसलों के खिलाफ बगावत के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।

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