केरल विधानसभा चुनाव 2026: कांग्रेस में थमा आंतरिक कलह का तूफान, शशि थरूर ने किया हुंकार के साथ वापसी का ऐलान
तिरुवनंतपुरम: केरल की राजनीति में पिछले कई हफ्तों से जारी कयासों और अनिश्चितताओं के बाद शनिवार को एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कूटनीतिज्ञ डॉ. शशि थरूर ने स्पष्ट कर दिया है कि वे न केवल कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े हैं, बल्कि आगामी केरल विधानसभा चुनाव में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की सत्ता में वापसी सुनिश्चित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देंगे। थरूर के इस रुख ने उन तमाम चर्चाओं पर विराम लगा दिया है, जिनमें उनके पार्टी छोड़ने या किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की तलाश करने की खबरें तैर रही थीं।
तिरुवनंतपुरम में शनिवार की सुबह पत्रकारों से मुखातिब होते हुए डॉ. थरूर ने अत्यंत सधे हुए और दृढ़ लहजे में अपने राजनीतिक भविष्य की दिशा तय कर दी। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि उनकी एकमात्र प्राथमिकता केरल में वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) की सरकार को हटाकर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार को सत्ता में वापस लाना है। थरूर ने मीडिया को संबोधित करते हुए भावुक और राजनीतिक रूप से परिपक्व बयान दिया कि मेरी केवल एक ही पार्टी है और वह है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस। उन्होंने पत्रकारों से विनम्रता पूर्वक अनुरोध किया कि उनसे यह सवाल बार-बार न पूछा जाए, क्योंकि वे शुरू से ही वैचारिक रूप से कांग्रेस के साथ रहे हैं और भविष्य में भी रहेंगे।
थरूर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब केरल कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और उन्हें दरकिनार किए जाने की खबरें लगातार सुर्खियां बटोर रही थीं। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले कोच्चि में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान उनके साथ हुए व्यवहार से वे काफी आहत दिखे थे। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम थी कि केरल के स्थानीय नेतृत्व का एक धड़ा थरूर की लोकप्रियता से असहज महसूस कर रहा है। इसी नाराजगी को दूर करने के लिए पिछले गुरुवार को नई दिल्ली में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी, जिसमें थरूर ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लंबी मुलाकात की थी।
दिल्ली में हुई उस बैठक को केरल की चुनावी रणनीति के लिए निर्णायक माना जा रहा है। आलाकमान ने थरूर को आश्वासन दिया है कि राज्य की राजनीति और आगामी चुनाव प्रचार में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। राहुल गांधी और खरगे से मुलाकात के बाद थरूर के सुर बदले हुए नजर आए। उन्होंने स्वीकार किया कि लोकतंत्र में और एक बड़े संगठन के भीतर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब लक्ष्य बड़ा हो, तो व्यक्तिगत शिकायतों को पीछे छोड़ना पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आलाकमान के साथ हुई बातचीत बेहद सकारात्मक रही है और अब संगठन के भीतर किसी भी प्रकार का कोई मनमुटाव शेष नहीं बचा है।
केरल विधानसभा चुनाव 2026 कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा है। पिछले दो कार्यकालों से पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार सत्ता पर काबिज है, जिसने केरल के उस पारंपरिक चुनावी चक्र को तोड़ दिया था जिसमें हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन होता था। कांग्रेस के लिए इस बार ‘करो या मरो’ की स्थिति है। ऐसे में शशि थरूर जैसे वैश्विक स्तर पर पहचाने जाने वाले चेहरे का सक्रिय होना पार्टी के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। थरूर की पकड़ विशेष रूप से युवाओं, शहरी मतदाताओं और पेशेवर वर्ग के बीच बहुत मजबूत है। उनकी बौद्धिक छवि और सोशल मीडिया पर उनकी जबरदस्त उपस्थिति यूडीएफ के पक्ष में माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
शनिवार को तिरुवनंतपुरम में संवाददाताओं से बातचीत के दौरान थरूर ने बार-बार इस बात को दोहराया कि वे चुनाव प्रचार के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उन्होंने कहा कि केरल की जनता बदलाव चाहती है और यूडीएफ के पास विकास का एक ठोस रोडमैप है। थरूर ने संकेत दिए कि वे राज्य के विभिन्न हिस्सों में जनसभाओं को संबोधित करेंगे और पार्टी की नीतियों को घर-घर तक पहुंचाएंगे। उनकी इस घोषणा से पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि थरूर के चुनाव मैदान में सक्रिय होने से न केवल तिरुवनंतपुरम के आसपास की सीटों पर, बल्कि मध्य और उत्तरी केरल में भी पार्टी को बढ़त मिलेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शशि थरूर का यह रुख कांग्रेस के भीतर की उस गुटबाजी को भी शांत करेगा जिसने हाल के दिनों में पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया था। केरल कांग्रेस के भीतर ‘ए’ ग्रुप और ‘आई’ ग्रुप की पुरानी प्रतिद्वंद्विता के बीच थरूर एक स्वतंत्र और लोकप्रिय चेहरे के रूप में उभरे हैं। उनके द्वारा पार्टी के प्रति वफादारी जताने से अब विरोधियों के पास उन पर हमला करने का कोई ठोस आधार नहीं बचा है। थरूर ने साफ किया कि चुनाव में उनकी भूमिका केवल एक प्रचारक की नहीं बल्कि एक ऐसे सिपाही की होगी जो अपनी पार्टी को जीतते हुए देखना चाहता है।
केरल के राजनीतिक समीकरणों को देखें तो कांग्रेस को सत्ता में लौटने के लिए ईसाई और मुस्लिम समुदायों के साथ-साथ हिंदू मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को अपने पाले में वापस लाना होगा। थरूर की सर्वसमावेशी छवि इस दिशा में मददगार साबित हो सकती है। शुक्रवार को भी उन्होंने कोझिकोड और पलक्कड़ के अपने दौरों के दौरान कार्यकर्ताओं को एकजुट रहने का संदेश दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी पद के लालच में नहीं बल्कि केरल के सर्वांगीण विकास की चिंता में सक्रिय हैं।
कांग्रेस आलाकमान के लिए केरल एक ऐसा राज्य है जहां से उसे लोकसभा में बड़ी संख्या में सीटें मिलती रही हैं। राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कांग्रेस का केरल की सत्ता में लौटना अनिवार्य है। राहुल गांधी का वायनाड से जुड़ाव और थरूर का केरल की जमीन पर सक्रिय होना, भाजपा की बढ़ती पैठ को रोकने के लिए भी जरूरी माना जा रहा है। थरूर ने अपने संबोधन के अंत में बहुत ही आत्मविश्वास के साथ कहा कि हम सभी एक साथ हैं और हमारा लक्ष्य एक है।
आज की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस ने उन सभी अटकलों पर हमेशा के लिए पर्दा डाल दिया है जो थरूर के भविष्य को लेकर लगाई जा रही थीं। अब गेंद यूडीएफ के पाले में है कि वह थरूर की इस ऊर्जा और लोकप्रियता का उपयोग किस तरह से चुनावी रणभूमि में करती है। जैसे-जैसे केरल चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, यह साफ हो गया है कि शशि थरूर कांग्रेस के लिए केवल एक सांसद नहीं, बल्कि सबसे बड़े स्टार प्रचारक और रणनीतिकार के रूप में उभरने वाले हैं।