मुंबई की सियासी रस्साकशी: संजय राउत का दावा— ‘मुंबई में भाजपा का ही बनेगा मेयर, शिंदे गुट की नाराजगी के बावजूद नहीं है कोई विकल्प’
मुंबई: बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) चुनाव के नतीजे आए लगभग दो हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन देश के सबसे अमीर नगर निकाय के सर्वोच्च पद यानी ‘मेयर’ की कुर्सी पर कौन बैठेगा, इसे लेकर सस्पेंस और खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बीच, शिवसेना (यूबीटी) के फायरब्रांड नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने एक बड़ा दावा कर महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। मंगलवार को मीडिया से रूबरू होते हुए राउत ने भविष्यवाणी की है कि मुंबई में भाजपा का ही मेयर बनेगा। उन्होंने तर्क दिया कि भाजपा अपने सहयोगी और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ इस प्रतिष्ठित पद को साझा करने के मूड में कतई नहीं है।
संजय राउत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब महायुति गठबंधन (भाजपा-शिंदे शिवसेना) के भीतर मेयर पद को लेकर भीतरखाने जबरदस्त तकरार की खबरें आ रही हैं। राउत ने कटाक्ष करते हुए कहा कि भले ही एकनाथ शिंदे की शिवसेना मेयर पद के लिए अडिग है और इस मुद्दे पर भाजपा से नाराज भी चल रही है, लेकिन उनके पास भाजपा की शर्तों को मानने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नगर निकाय का नेतृत्व उनके पास ही रहेगा। बदले में शिंदे गुट को कुछ अन्य महत्वपूर्ण पद या समितियां सौंपी जा सकती हैं, लेकिन मेयर की कुर्सी उन्हें छोड़नी ही होगी।
बाल ठाकरे की जन्म शताब्दी का वास्ता और होटल पॉलिटिक्स
बीएमसी की सत्ता के गलियारों में छिड़ी इस जंग के पीछे एक भावनात्मक और प्रतीकात्मक कारण भी है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के नेताओं का तर्क है कि साल 2026 शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे का जन्म शताब्दी वर्ष है। इस ऐतिहासिक अवसर पर मुंबई का प्रथम नागरिक (मेयर) शिवसेना से ही होना चाहिए, ताकि बालासाहेब को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सके। इसी मांग के साथ शिंदे ने दबाव बनाने की रणनीति अपनाई है और अपने सभी नवनिर्वाचित पार्षदों को एकजुट रखने के लिए एक पांच सितारा होटल में ठहराया हुआ है।
हालांकि, संजय राउत ने इस रणनीति पर तंज कसते हुए कहा कि भाजपा इन भावनात्मक दलीलों के आगे झुकने वाली नहीं है। राउत के अनुसार, भाजपा अपनी ताकत के दम पर मुंबई पर पूर्ण नियंत्रण चाहती है और वह ‘बड़े भाई’ की भूमिका में कोई समझौता नहीं करेगी। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा, “मुंबई में भाजपा का ही मेयर होगा, यह लगभग तय है।”
नतीजों का गणित: बहुमत से दूर हर खिलाड़ी
बीएमसी चुनाव के जो नतीजे 15 जनवरी को घोषित हुए थे, उन्होंने मुंबई की राजनीति को एक पेचीदा मोड़ पर खड़ा कर दिया है। 227 वार्डों वाले इस विशाल नगर निकाय में किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। नतीजों के अनुसार, भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने कड़े मुकाबले में 65 सीटें जीतकर अपनी ताकत का अहसास कराया है। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 29 सीटें मिली हैं, जबकि कांग्रेस 24 सीटों पर सिमट गई है। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की है और शेष सीटें अन्य छोटे दलों व निर्दलीयों के खाते में गई हैं।
इस अंकगणित को देखें तो भाजपा और शिंदे गुट मिलकर आसानी से बहुमत के आंकड़े (114) को पार कर लेते हैं, लेकिन पेंच नेतृत्व को लेकर फंसा है। भाजपा का तर्क है कि वह 89 सीटों के साथ गठबंधन में सबसे बड़ी शक्ति है, इसलिए मेयर पद पर उसका नैसर्गिक दावा है। दूसरी ओर, शिंदे गुट 29 सीटों के बावजूद ‘शिवसेना’ के नाम और विरासत के आधार पर इस पद की मांग कर रहा है।
मुंबई की सत्ता का भविष्य और गठबंधन की चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संजय राउत का यह बयान महायुति गठबंधन के भीतर दरार डालने की एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है। राउत जानते हैं कि यदि शिंदे गुट को मेयर पद नहीं मिलता है, तो उनके कार्यकर्ताओं और पार्षदों के बीच नाराजगी बढ़ेगी, जिसका सीधा फायदा उद्धव ठाकरे की शिवसेना को भविष्य में मिल सकता है।
फिलहाल, मुंबई की जनता और राजनीतिक हलकों की नजरें भाजपा के केंद्रीय आलाकमान और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगली मुलाकात पर टिकी हैं। क्या भाजपा शिवसेना की ‘जन्म शताब्दी’ वाली दलील मानकर लचीला रुख अपनाएगी, या फिर संजय राउत का दावा सच साबित होगा और मुंबई को भाजपा का पहला मेयर मिलेगा? इसका फैसला अगले कुछ दिनों में होने वाली पार्षदों की पहली बैठक में हो जाएगा।