केरल की सियासत में उबाल: कासरगोड चुनाव नतीजों पर मंत्री साजी चेरियन के बयान ने छेड़ी नई बहस, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता पर आमने-सामने आए दल
तिरुवनंतपुरम: केरल के कासरगोड और मलप्पुरम में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने न केवल राज्य की चुनावी तस्वीर साफ की है, बल्कि एक गंभीर वैचारिक और राजनीतिक युद्ध को भी जन्म दे दिया है। कासरगोड नगरपालिका के नतीजों के बाद राज्य के मंत्री साजी चेरियन द्वारा दी गई एक टिप्पणी ने केरल के राजनीतिक गलियारों में भूकंप ला दिया है। चेरियन ने चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए जिस तरह से धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा किया, उसने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को भड़का दिया है। हालांकि, विवाद बढ़ता देख अब मंत्री ने अपनी सफाई पेश की है, लेकिन विपक्षी दल इस मुद्दे को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की घेराबंदी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। मामला केवल एक चुनावी जीत-हार का नहीं रह गया है, बल्कि यह केरल के उस ‘सेकुलर’ ताने-बाने पर सवाल उठा रहा है, जिस पर वामपंथी दल हमेशा गर्व करते रहे हैं।
कासरगोड नगरपालिका की 39 सीटों के समीकरणों ने इस बार एक स्पष्ट विभाजन रेखा दिखाई है। परिणामों के अनुसार, मुस्लिम बहुल इलाकों में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का वर्चस्व रहा, जबकि हिंदू बहुल क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी पैठ मजबूत की। इस भौगोलिक और धार्मिक आधार पर बंटे जनादेश को लेकर साजी चेरियन ने जो चिंता जताई, उसने विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी एक नई चर्चा छेड़ दी है।
चुनावी नतीजों का धार्मिक ध्रुवीकरण और साजी चेरियन की चिंता
कासरगोड नगरपालिका के आंकड़े इस बार बेहद चौंकाने वाले रहे हैं। कुल 39 सीटों में से मुस्लिम लीग ने 22 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, जबकि भाजपा ने 12 सीटों पर अपना परचम लहराया है। इस पूरे चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली बड़ी पार्टियों—कांग्रेस और सीपीआई(एम)—का प्रदर्शन रहा है। सीपीआई(एम) को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा, जबकि कांग्रेस मात्र दो सीटें ही जीत सकी। मंत्री साजी चेरियन ने इसी बिंदु को आधार बनाकर अपना बयान दिया था। उन्होंने कहा कि जहां सांप्रदायिक राजनीति की बात करने वाली भाजपा और विशिष्ट धार्मिक आधार वाली मुस्लिम लीग फल-फूल रही हैं, वहां धर्मनिरपेक्ष ताकतों का कमजोर होना राज्य के भविष्य के लिए चिंताजनक है।
साजी चेरियन का मूल तर्क यह था कि कासरगोड में चुनाव के दौरान विकास के मुद्दों के बजाय धार्मिक पहचान हावी रही। उनके अनुसार, मुस्लिम बहुल इलाकों ने एकतरफा मुस्लिम लीग को वोट दिया और हिंदू बहुल क्षेत्रों ने भाजपा को। उन्होंने इसे केरल की पारंपरिक साझा संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए एक खतरे के रूप में पेश किया। हालांकि, कांग्रेस ने उनके इस बयान को मुस्लिम लीग के खिलाफ एक हमले के रूप में देखा और आरोप लगाया कि मंत्री अल्पसंख्यकों की जीत को सांप्रदायिक चश्मे से देख रहे हैं।
विवाद पर सफाई: ‘मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया’
जैसे ही विपक्षी दलों ने साजी चेरियन पर हमला तेज किया, मंत्री ने अपनी टिप्पणियों पर विस्तृत सफाई पेश की। चेरियन ने दावा किया कि उनके बयान को गलत संदर्भ में लिया गया और लोगों को गुमराह करने के लिए उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। सोमवार को मीडिया से बात करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना नहीं था, बल्कि वह केवल चुनावी जमीनी हकीकत का विश्लेषण कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य यह बताना था कि जिन क्षेत्रों में धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली पार्टियों को मजबूत होना चाहिए था, वहां उनकी उपस्थिति सिमट गई है।
चेरियन ने अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने केवल उन विजेताओं के नाम पढ़े जाने की बात कही थी जो धार्मिक ध्रुवीकरण के आधार पर जीत कर आए हैं। उन्होंने अपनी चिंता दोहराते हुए कहा कि वह नहीं चाहते कि कासरगोड और मलप्पुरम की यह स्थिति केरल के अन्य हिस्सों में भी दोहराई जाए। मंत्री ने जोर देकर कहा कि आरएसएस द्वारा फैलाई जा रही सांप्रदायिकता का विरोध करना नितांत आवश्यक है, लेकिन उस सांप्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए ‘अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता’ का सहारा लेना आग को आग से बुझाने जैसा होगा। उनके अनुसार, सांप्रदायिकता के खिलाफ एकमात्र ढाल केरल में वामपंथ और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मजबूत करना ही है।
कांग्रेस का पलटवार: मुख्यमंत्री विजयन से मांगा स्पष्टीकरण
साजी चेरियन की सफाई के बावजूद कांग्रेस इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में नहीं है। केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष सनी जोसेफ ने मंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि क्या साजी चेरियन ने यह विवादास्पद बयान मुख्यमंत्री की अनुमति से दिया था? जोसेफ ने कहा कि सीपीआई(एम) को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या यह पार्टी का आधिकारिक रुख है कि मुस्लिम लीग की जीत सांप्रदायिक है।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि साजी चेरियन का बयान दरअसल बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करने की एक कोशिश है। नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीशन ने भी इस पर हमला करते हुए कहा कि सीपीआई(एम) अपनी चुनावी विफलता को छिपाने के लिए सांप्रदायिकता का कार्ड खेल रही है। कांग्रेस का तर्क है कि यूडीएफ (UDF) हमेशा से सभी समुदायों को साथ लेकर चला है और मुस्लिम लीग की जीत को सांप्रदायिक करार देना मतदाताओं के अपमान के समान है। सोमवार को इस मुद्दे ने विधानसभा से लेकर सड़कों तक हलचल पैदा कर दी, जहां यूडीएफ कार्यकर्ताओं ने मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किए।
एलडीएफ बनाम यूडीएफ: सांप्रदायिकता के खिलाफ कौन है असली ढाल?
विवाद के केंद्र में अब यह बहस है कि केरल में सांप्रदायिकता के खिलाफ सबसे सख्त रुख किसका है। साजी चेरियन ने अलप्पुझा में संवाददाताओं से बात करते हुए कहा कि केवल सीपीआई(एम) और एलडीएफ (LDF) ने ही केरल में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ अडिग स्टैंड लिया है। उन्होंने यूडीएफ और विशेष रूप से नेता प्रतिपक्ष वीडी सतीशन पर आरोप लगाया कि वे चुनाव जीतने के लिए विभाजनकारी राजनीति का सहारा ले रहे हैं। चेरियन ने दावा किया कि वामपंथियों ने केरल में शासन का एक ऐसा वैकल्पिक मॉडल पेश किया है जो धर्म और जाति से ऊपर उठकर है।
मंत्री ने यह भी तर्क दिया कि आरएसएस की विचारधारा का मुकाबला केवल राजनीतिक विरोध से नहीं, बल्कि एक मजबूत सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से ही किया जा सकता है, जो वामपंथी दल प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लोग सांप्रदायिक आधार पर वोट देने की इसी प्रवृत्ति को अपनाते रहे, तो केरल की सामाजिक शांति भंग हो सकती है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों का कहना है कि सीपीआई(एम) खुद ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है ताकि वह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच ‘मसीहा’ की भूमिका निभा सके। फिलहाल, कासरगोड के इन 39 वार्डों के नतीजों ने केरल की पूरी राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां आने वाले विधानसभा चुनावों में धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा गढ़ी जा सकती है।