उल्हासनगर नगर निकाय में बड़ा सियासी उलटफेर: वीबीए के दो पार्षदों ने थामा शिवसेना का हाथ, भाजपा को पछाड़कर ‘किंगमेकर’ बने एकनाथ शिंदे
उल्हासनगर/ठाणे: महाराष्ट्र की राजनीति में ‘नंबर गेम’ और ‘हृदय परिवर्तन’ का खेल रुकने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में संपन्न हुए नगर निकाय चुनावों के परिणामों के बाद अब गठबंधन सहयोगियों के बीच वर्चस्व की जंग तेज हो गई है। ठाणे जिले के महत्वपूर्ण उल्हासनगर नगर निकाय में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है, जिसने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बढ़त को कम कर दिया है। वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) के दो नवनिर्वाचित पार्षदों ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को अपना समर्थन दे दिया है। इस रणनीतिक कदम के बाद अब शिंदे गुट नगर निकाय पर नियंत्रण के मामले में अपनी सहयोगी भाजपा से एक कदम आगे निकल गया है।
यह घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उल्हासनगर में सत्ताधारी महायुति गठबंधन के दोनों घटक दलों, भाजपा और शिवसेना ने एक-दूसरे के खिलाफ अलग-अलग चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन वीबीए के पार्षदों के पाला बदलने से अब शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया है। इसे भाजपा के लिए एक बड़े झटके और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सोची-समझी घेराबंदी के तौर पर देखा जा रहा है।
सत्ता का गणित: 78 सीटों वाले सदन में बदली तस्वीरों की हकीकत
78 सदस्यों वाले उल्हासनगर नगर निकाय में जीत का आंकड़ा बेहद दिलचस्प रहा था। चुनाव परिणामों के अनुसार, भाजपा 37 सीटें जीतने में सफल रही थी, जबकि शिवसेना (शिंदे गुट) को 36 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। केवल एक सीट के अंतर से भाजपा खुद को बड़ा भाई मानकर मेयर पद पर अपना दावा मजबूत मान रही थी। अन्य सीटों पर कांग्रेस, एक स्थानीय संगठन और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने एक-एक सीट पर जीत हासिल की थी। वहीं प्रकाश अंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA), जिसने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था, के खाते में दो सीटें आई थीं।
रविवार तक के आंकड़ों के अनुसार भाजपा सबसे आगे थी, लेकिन सोमवार को हवा का रुख पूरी तरह बदल गया। वीबीए के दो पार्षदों के शिवसेना में शामिल होने के बाद अब शिंदे गुट की ताकत बढ़कर 38 हो गई है, जबकि भाजपा 37 पर ही टिकी हुई है। इस छोटे से अंतराल ने मेयर चुनाव की पूरी पटकथा को बदल दिया है। अब शिवसेना न केवल सबसे बड़ा गुट बन गई है, बल्कि नगर निकाय की कमान अपने हाथ में लेने के लिए सबसे प्रबल दावेदार के रूप में उभरी है।
आधी रात की मुलाकात और समर्थन का आधिकारिक एलान
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे दलबदल की पटकथा बेहद गोपनीय तरीके से लिखी गई। वंचित बहुजन अघाड़ी के दो पार्षद, सुरेखा सोनावणे और विकास खरात ने रविवार को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री के पुत्र और सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे भी मौजूद थे, जिन्हें ठाणे और आसपास के क्षेत्रों में शिवसेना की संगठन क्षमता का मुख्य रणनीतिकार माना जाता है।
बैठक के दौरान विधायक डॉ. बालाजी किणिकर, पूर्व मेयर सुनील चौधरी और शिवसेना प्रवक्ता राहुल लोंढे सहित कई वरिष्ठ नेता उपस्थित थे। मुख्यमंत्री शिंदे ने दोनों पार्षदों का स्वागत करते हुए उन्हें आश्वासन दिया कि उनके वार्डों के विकास के लिए फंड की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। इस समर्थन के बाद शिवसेना खेमे में जश्न का माहौल है, जबकि भाजपा नेतृत्व इस अप्रत्याशित कदम से हैरान है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम आगामी विधानसभा और अन्य स्थानीय चुनावों से पहले ठाणे जिले में अपनी पकड़ मजबूत करने की शिंदे की बड़ी योजना का हिस्सा है।
विकास का हवाला और दलित बस्ती सुधार योजना का एजेंडा
शिवसेना को समर्थन देने वाले वीबीए के पार्षदों, सुरेखा सोनावणे और विकास खरात ने अपने फैसले का बचाव करते हुए इसे विशुद्ध रूप से विकास आधारित निर्णय बताया है। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि विपक्ष में रहकर वे अपने वार्ड की जनता के साथ न्याय नहीं कर पाते। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मुख्य उद्देश्य अपने क्षेत्रों का समग्र विकास करना और विशेष रूप से ‘दलित बस्ती सुधार योजना’ के तहत रुके हुए कार्यों को लागू करवाना है।
इन पार्षदों का तर्क है कि राज्य में महायुति की सरकार है और मुख्यमंत्री के साथ रहने से विकास योजनाओं के लिए धन आवंटित करवाना आसान होगा। हालांकि, राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि कांग्रेस-वीबीए गठबंधन से जीतकर आने के बाद शिंदे गुट में शामिल होना मतदाताओं के साथ विश्वासघात है, लेकिन पार्षदों ने जोर देकर कहा है कि उन्होंने यह फैसला अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों को सर्वोपरि रखकर लिया है। इस दलबदल ने प्रकाश अंबेडकर की पार्टी के लिए भी एक नई चुनौती खड़ी कर दी है, क्योंकि उनके चुने हुए प्रतिनिधि विचारधारा के बजाय सत्ता की ओर रुख कर रहे हैं।
महायुति के भीतर बढ़ती खींचतान और भाजपा की चुनौतियां
उल्हासनगर का यह घटनाक्रम भाजपा और शिवसेना (शिंदे) के बीच बढ़ती अंदरूनी प्रतिस्पर्धा को भी उजागर करता है। भले ही दोनों दल राज्य स्तर पर साथ हों, लेकिन स्थानीय निकायों में वर्चस्व की जंग तीखी होती जा रही है। भाजपा ने उल्हासनगर में काफी मेहनत की थी और 37 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। भाजपा नेताओं को उम्मीद थी कि वे निर्दलीयों या छोटे संगठनों के सहयोग से मेयर की कुर्सी तक पहुंच जाएंगे, लेकिन शिंदे गुट ने वीबीए के पार्षदों को अपने पाले में लाकर भाजपा के अरमानों पर पानी फेर दिया है।
भाजपा के स्थानीय नेतृत्व ने इस पर अभी तक कोई आधिकारिक तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन पार्टी के भीतर इस बात को लेकर सुगबुगाहट है कि गठबंधन सहयोगी ही उनकी जीत के रथ को रोकने का काम कर रहे हैं। यह स्थिति महायुति के समन्वय पर भी सवालिया निशान लगाती है। क्या मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सहयोगियों के प्रभाव क्षेत्र में सेंध लगा रहे हैं? यह सवाल अब भाजपा के गलियारों में गूंज रहा है।
मेयर चुनाव की ओर बढ़ती निगाहें: क्या होगा अगला कदम?
अब सबकी निगाहें मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव पर टिकी हैं। शिवसेना (38) अब भाजपा (37) से आगे है। अब केवल एक-एक सीट जीतने वाली कांग्रेस, स्थानीय संगठन और निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। यदि ये छोटे गुट भी किसी एक पक्ष की ओर झुक जाते हैं, तो मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा। हालांकि, मौजूदा समीकरणों को देखते हुए पलड़ा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के पक्ष में झुकता दिख रहा है।
उल्हासनगर ठाणे जिले का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र है और यहाँ की नगर निकाय पर कब्जा होने का मतलब है कि उस पूरे क्षेत्र की राजनीति और संसाधनों पर नियंत्रण। एकनाथ शिंदे के लिए यह अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई है क्योंकि ठाणे उनका गढ़ माना जाता है। वहीं भाजपा के लिए यह आत्मसम्मान का विषय है क्योंकि वे सबसे अधिक सीटें जीतने के बाद भी सत्ता से दूर होते दिख रहे हैं। आने वाले कुछ दिन उल्हासनगर की राजनीति में और भी नाटकीय मोड़ लेकर आ सकते हैं।